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जींस गांव की गोरी तक

जींस गांव की गोरी तक

पहनावे को लेकर परंपरावादी भले ही कितने भी नियम कानून बनाते रहें, जींस ने गांवों-कस्बों से लेकर छोटे शहरों तक में अपनी जगह बना ली है। यह सब पिछले दस सालों में ही हुआ है। जींस कभी पश्चिम में युवा स्वातंत्र्य का पर्याय बनी थी। अब यह भारत के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में भी युवाओं के बीच आजादी का अर्थ लेकर आ रही है। परिवारों ने भी इसे स्वीकार किया है। सिर पर पल्ला डाले दादी-नानी, बुआ-ताई और मां को अब बेटी के लंबी कुर्ती के साथ जींस पहनने पर कोई ऐतराज नहीं है। इसी तरह पिताओं ने भी अब यह मानना शुरू कर दिया है कि किसी खास पहनावे पर किसी खास लिंग का अधिकार नहीं है। यकीन न हो तो अमेरिकी कंपनी डॉकर्स के भारतीय प्रवक्ता शूमोन चटर्जी से पूछ लीजिए। भारत में लीवाइस जींस इसी कंपनी का प्रॉडक्ट है।

 शूमोन के अनुसार, पिछले कुछ सालों में कंपनी ने महानगरों के अलावा कस्बों और छोटे शहरों में तेजी से तरक्की की है। खासकर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में। यह तो ब्रांड की बात हुई, पर बड़ी कंपनियों के प्रॉडक्ट्स की नकल पर लोकल माल बनाने वाले भी काफी तरक्की कर रहे हैं। समाज शास्त्री दिशान मलिक कहते हैं, जींस जैसा पहनावा परिवारों में एक नई सोच का प्रतीक भी है। यह इस बात को स्थापित करता है कि हम आने वाले बदलावों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। फिर अगर बेटी को बेटे जैसे पहनावे पहनाने के लिए हम तैयार हैं तो इसका यही अर्थ है कि हम दोनों को एक समान मानने के लिए आखिरकार तैयार हो रहे हैं।

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  • Web Title:जींस गांव की गोरी तक