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हम परिवार से अ-परिवार के युग में आ रहे हैं।

हम परिवार से अ-परिवार के युग में आ रहे हैं।

इस दशक में परिवारों का रूप तेजी से बदला है। सब परिवार एक तरह के नहीं हैं, लेकिन बदलाव सबमें आया है। समाज के अ-समान विकास के कारण परिवारों के नक्शे बहुस्तरीय हैं। तो भी परिवारों में बहुत सी बातें समान हैं। परिवार का आकार, परिवार का घर, परिवार की आमदनी का जरिया, परिवार की उत्कर्षेच्टु गतिमयता, उसके पास उपलब्ध संचार और शिक्षा के समान तथा आराम देने वाली सुविधाएं और खाली वक्त आदि कुछ  संकेतक बताते हैं कि आर्र्थिक-सामाजिक बदलाव का सबसे ज्यादा दबाव परिवारों पर है। परिवार बदले हैं और बदल रहे हैं।
अब न तो कहीं बड़े संयुक्त परिवार या कुनबे बचे हैं जिनमें तीन-चार पीढ़ियां एक साथ रहती हों, न ऐसे परिवार बचे हैं जिनमें तीन पीढ़ियां एक साथ सुखपूर्वक रहती हैं। जहां हैं, उनमें स्पेस की प्राइवेसी की नई समस्याएं आने लगी हैं। अक्सर खबरें आती रहती हैं कि बहू-बेटे ने मिलकर माता-पिता को बुढ़ापे में घर से बाहर निकाल दिया। फिल्म  ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ने इस तरह के वृद्धों की समस्याओं को बड़े तीखे ढंग से उजागर किया है। वृद्धाएं कहां गईं, इस ओर अभी नजर ही नहीं है।

अब शहरों में, खासकर बड़े शहरों में, महानगरों में दो पीढ़ी वाले एकल परिवार ही ज्यादा नजर आते हैं। पिछले दस सालों में इस एकल परिवार में भी समस्याएं बढ़ी हैं। एकल परिवार अब ‘एक-एक’ के अलग-अलग परिवार और ‘अ-परिवार’ तक विखंडित हुए हैं।

अगर किसी बड़े शहर में किसी पुरानी बस्ती में यथा दिल्ली, कोलकाता में कुछ बड़े परिवार कई पीढ़ियां एक साथ जीते हुए कभी-कभी सुन पड़ते हैं तो मालूम पड़ता है उनका एक चूल्हा नहीं है, बल्कि अनेक चूल्हे हैं, रसोई हैं। महानगर में अलग-अलग रहना बहुत  महंगा है, इस कारण वे एक हवेली या बड़े मकान में रहते हैं लेकिन जिस गति से शहरी जमीन और बस्तियों की कीमतें बढ़ी हैं, उसके कारण परिवारों में बिखराव हुआ है।यह लेखक अपने अनुभव से पंद्रह-सोलह  साल पहले आबाद एक ऐसे बड़े परिवार को जानता है जो पुरानी दिल्ली में रहता था, जिसमें साठ-सत्तर का कुनबा रहा करता था। चार पीढ़ी एक साथ रहती थीं। अब वह धीरे-धीरे बिखर गया है। शायद वह हवेली भी बिक गई होगी। उसमें कोई बिजनेस, कोई शेरूम, कोई दफ्तर खुल गया होगा। पिछले दसेक सालों में हर शहर ने अपना रिहायशी स्पेस बढ़ाया है। सोसाइटीज बनी हैं, फ्लैट सिस्टम लोकप्रिय हुआ है। और पूरी की पूरी ‘सिटीज’ या ‘मेगासिटीज’ बनी हैं। ये मिनी शहर की तरह बसाए गए हैं। इस तरह महानगरों में शहरों के बीच उप ‘सिटीज’ बनी हैं और शहरों के पुराने स्पेस को बदल रही हैं। उनमें नए परिवार अपने-अपने स्वर्ग को बनाने  चले गए हैं। आमदनी और काम की नजर से ऐसे नए परिवार छोटे ‘डबल इनकम ग्रुप’ वाले हैं, जिन्हें अंग्रेजी में ‘डिंक्स’ कहा जाता है। पतिदेव नौकरी करते हैं, बीबीजी नौकरी करती हैं। चौबीस गुणा सात घ्ांटे वाली नौकरी है, गाड़ी हैं, लैपटॉप हैं, ब्लैकबेरीज हैं। ..और बाल बच्चों? वे तो फिलहाल स्थगित हैं। ये नई सिटीज, सोसाइटीज महानगरों के बाहरी इलाकों में बन उठी हैं। इन्होंने परिवार को बदला है, उसकी विजीबिलिटी को बदला है। अब किसी पार्टी में, शादी-ब्याह में पति-पत्नी इकट्ठे नहीं आ पाते। एक पहुंचता है, तो दूसरा एक बुके के साथ सॉरी का संदेश भेजकर दफ्तर में अटका रहता है।

पैसा, पार्टी  और पावर की तीन ‘पी’ नए एकल परिवारों से बच्चों को पोस्टपोन कर रही हैं। बच्चों को लेकर देर रात पार्टियों में मजाा नहीं किया जा सकता। तो इस  तरह के परिवारों में बच्चों सबसे पहले आउट हैं। यह ऐसे एकल परिवार हैं जिनमें बच्चों की किलकारियां कम सुनाई पड़ती हैं।

दिल्ली का ही प्रापर्टी सेल-परचेज के चलन को देख लिया जाए या अखबारों में, टीवी में, रेडियो में रीयल एस्टेट के बिक्रेताओं बिल्डरों के नित्य छपने वाले विज्ञापन देख लिए जाएं तो हमें परिवारों के तेज संक्रमण का एक नक्शा मिल सकता है। यह सब पिछले सालों में तेजी से हुआ है। पुरानी दिल्ली के दो-तीन तल्ले वाले एक ही घर और परिवार से जगर-मगर मकान खूब बिके हैं। उनमें बाजार बने हैं और औलादें फ्लैटों में, सोसाइटियों में रहने आ गई हैं। वे आपस में मिलते रहते हैं, लेकिन एक जगह रहने वाला बड़ा परिवार वे नहीं हैं। पुरानी दिल्ली के अनेक बाशिंदे हिंदू-मुसलमान सब अपने-अपने पुश्तैनी बड़े मकान तोड़-बेच कर नई जगहों में जाकर विभक्त हुए हैं। यों अब मोबाइल फोन हैं, इंटरनेट हैं, कारें हैं और फ्री टॉक टाइम है। खूब बातें हो सकती हैं, लेकिन मिलना मयस्सर नहीं होता।
पुराने परिवारों को विकास की प्रकिया में एकल होना ही था और यह यहीं नहीं हुआ दुनिया भर में हुआ है। यूरोप में, अमेरिका में यह प्रक्रिया उन्नीसवीं सदी के आखिर तक पूरी हो गई थी जबकि अपने यहां अभी तक जारी है।
नए शहरी, अर्ध शहरी परिवारों के अनेक स्तर हैं। गांव के परिवारों में पुश्तैनी जमीन के अगली पीढ़ी तक आते छोटी जोतोंे में बदलने, उनके अधिक लाभदायक न रहने और बेरोजगार होने के कारण या कृषि में  नई पीढ़ी की दिलचस्पी के कमतर होते जाने के कारण गांव के परिवार ही नहीं उजड़े, गांव के गांव तक सूने हो गए हैं। गांव शहर में या तो मिल गए हैं या शहर बन गए है। इसका असर कृषि योग्य जमीन से जुड़े पुराने ढंग के परिवारों के आकार पर पड़ा है।

गांवों में वह सब पहुंच रहा है जो बड़े शहरों में चलन में है। टीवी ने, मोबाइल ने गांव के भीतर  बचे-खुचे  कृषि जीवी परिवारों में अजीब किस्म का कंपटीशन, संचय की जगह खर्चीलापन और आरामतलबी बढ़ा दी है। वे जिस ग्लोबल शहरी संस्कृति का उपभोग करते हैं, वह उन्हें घर बैठे टीवी से, फिल्मों से मिलती है और वह उन्हें इतना बदल  चुकी है कि पंजाब के ग्रामीण नौनिहालों को शहर आकर पगड़ी बांधना तक सीखना पड़ता है।
गांव के परिवारों में अब आपस में कम बातें होती हैं। घर की औरतें जो पहले अचार डालने, मसाले सुखाने धूप लगाने, कपडे धोने-सुखाने और बड़ियां-पापड बेलने में टाइम गुजारती थीं अब ‘बालिका वधू’ और ‘बैरी पिया’ देख मोबइल पर डिस्कस करती हैं। उनका कान कहीं और लगा होता है और टीवी उनकी आखें अपने संग चिपका लेता है। घर में घरवाली का बदलना परिवार के ढांचे की चूल का बदलना है। अब उसके पास खाली समय है, खर्च के लिए कुछ पैसा है, उसका रोल कुछ तो बदला है। बढ़ती घरेलू हिंसा की खबरें इस बदलाव और उसमें औरतों के रोल के बदलने के संकेत देती हैं। इस बदलते रोल को मर्द पसंद नहीं करते। गांवों में भी  परिवारों के ये दोनों पहिए हिल रहे हैं।

चौपालों की जगहों पर दुकानें हैं। समूह का जीवन और उसके लिए समय नहीं है। गांव में कभी हर किसी को हरेक की खबर रहती थी। अब हर व्यक्ति अपने में मगन है। लोग एक-दूसरे से ज्यादा बेगाने रहने लगे हैं। मुकदमे बढ़ रहे हैं। फौजदारियां बढ रही हैं।गांव के लड़के की शादी में दहेज ग्लोबल ब्रांडों को मांग कर लिया जाता  है। छोरा हनीमून मनाने शिमला जाने लगा है। जो बहुरिया मनाली-शिमला जाने लगी है वह बहुरिया नए जमाने की रेपिडेक्स की अंग्रेजी वाली है। उसकी जरूरतें अलग हैं। मेकअप है, पार्लर हैं, क्योंकि वह खुद को करीना कपूर और कैटरीना कैफ से कम नहीं मानती। लड़का शाहरुख खान, शाहिद कपूर या अक्षय कुमार, अभिषेक से अपने को कम नहीं समझता। टीवी ने उसे बराबरी पर दिखने का अनमोल हक दिया है।

गांव हिंदी के आज के पाठक के लिए एक किताबी रूमानी नक्शा है, जिसमें झोपड़ी, गाय-भैंस दिखते हैं। सच्चाई यह है कि अब न तो  शिवपूजन सहाय के ‘किसान’ वाले गांव हैं, न प्रेमचंदीय कहानी के गांव हैं। अब नए गांव हैं जिनमें गलियों में दुकानें उग आई हैं और चौपालों में सिनेमाघर बन गए हैं। शहर अपने हर आइटम के साथ  हरेक के जीवन में कुछ न कुछ मौजूद होने लगा है। मोबाइल, मारूति, सेंट्रो, हीरो होंडा या बजाज मोटर साइकिलों ने गांवों में भी लगभग एकल परिवार बना दिए हैं।

अब गांव का लड़का गांव की लड़की को मोटर साइकिल के पीछे बिठाकर फिल्मी सीन देता है। परिवार का नक्शा उसकी बुनियाद में बदल रहा है। पुराने परिवार के नक्शे में से नया निकल रहा है। स्पेस के बदलने से परिवार बदले हैं, परिवार नियोजन के निजी तरीके सुलभ होने से परिवार बदले हैं, मंहगाई से बदले हैं और उपभोग के लालच से बदले हैं। ये सब पिछले दस साल में तेजी से हुआ है।अब ऐसी नई पीढ़ी कस्बे में तब्दील होते जाते हर गांव में है। इन घरों में आत्मसंतोषी भाग्यवादी लोग नहीं रहते।

चमक-दमक उसकी दूध जैसी सफेदी और ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ की दादी की उम्र की बा के काले बालोंका राज जानते हैं। फेअरनेस क्रीमों, बाल रंगने वाली हेअर डाइयों, स्किन क्रीमों, थ्रेडिंग के बारे में बारे में जानते/जानती हैं। यहां अब होरी, गोबर या घीसू, माधव नहीं रहते, न उनके परिवार धनिया के परिवार की तरह हैं। अब यहां भी सबकी महत्वाकांक्षा आसमान छूने की है। बुढ़ियाएं बाल काले कर भवें बनाकर रहती हैं।

यह ‘चला मुरारी हीरो बनने’ से आगे निकलकर ‘मैं भी माधुरी दीक्षित बनूंगी’ गाते हुए ‘मालामाल वीकली’ में मस्त होकर ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ वाला गांव है, जिसमें ‘बिल्लूा बारबर’ अपनी गतिहीनता के कारण अपने बच्चों के लिए अनादर्श है क्योंकि महानगर यानी शाहरुख खान हर जगह हावी है। इत्तफाक से वह बिल्लू के बचपन का दोस्त भी है और इस वजह से पूरा गांव खुद को एक तमाशबीन में बदल लेता है। यहां ऐसे युवा बन रहे हैं जिनका चित्त अपने आसपास से ही रूठा रहता है।

यहां जाति बाहर प्रेम बढ़ रहे हैं क्योंकि प्रेम का स्पेस बनने लगा है, संवाद की जगह होने लगी है। ऐसे लोग नया परिवार बनाने को चलते हैं कि नए एकल आजाद परिवार के बनने से डरने वाले उनकी  हत्याएं कर देते हैं। एक विकट किस्म का विद्वेष स्पर्धा और जाति-धर्म की अधिकतम कट्टरता ओर अति असहिष्णुता फैली रहती है।
गांवों-कस्बों बड़े शहरों में स्पेस बदल गया है। पैसे की आमद और खर्च के तरीके बदल गए हैं। लोगों के मिजाज बदल गए हैं। ऐसे बड़े परिवर्तनों में परिवार भी एक आदर्श परिवार रूप में हर स्तर पर कमजोर हुआ है।

शहरों की नई पीढ़ी में परिवार बसाना अब एक मजबूरी है, शौक नहीं है। अपने ही परिवार से बेगानापन नए किस्म का बेगानापन है जो उपभोक्तावादी समय में कामनाओं की निर्बाध आपूर्ति के होने और न होने के बीच जन्म लेता है। यह नई पीढ़ी अपने में बंद अपने में खेाई है। वह परिवार में रहती है लेकिन परिवार की होकर कम ही रहती है। ऐसी पीढ़ी का परिवार बने भी तो उनमें जिंदगी नहीं है। उपभोग की लालसा, अधिक कमाने की आपाधापी, काम की जगहों में चौबीस-सात के हिसाब से काम के लिए तत्पर रहने की मजबूरियां अपने-अपने माता-पिताओं से अलग रहने वाले पति-पत्नी को इतना समय नहीं देते कि वे आपस में नई कहानी के दिनों के नायक-नायिकाओं की तरह कुछ देर लड़ भी सकें और अलग-अलग नाराज होकर रह भी सकें। यह समय किसी राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी को आपस में तनाव पालकर अलग-अलग रहने का समय तक नहीं देता। नई कहानी पाले संबधों के छूटने की जगह योह समय संबंध न बनने  देने का युग है। यह सामने अनबोले का और बाद में मोबाइल पर बोलने, इंटरनेट पर मेसेज लेने-देने और देर रात थक-चूर कर घर के किसी बिस्तर में ढेर हो जाने का है।

ऐसे प्रिवार कहने को तो छोटे कहे जा सकते हैं लेकिन ‘ऊंचे उठते’, अपवार्ड मोबाइलद्घ ये परिवार अपने परिवारीपन को खो चुके हैं। एक-दूसरे की चिंता करने से बनने वाले प्यार के बंधन एक-दूसरे की केअर से पैदा होने वाली कर्तव्यशीलता और ऊंचे-नीचे हाइरार्कीकल संबंधों की श्रेणियां कमाई, करियर और समय की आपाधापी में बिला गई हैं। यह बड़े शहरों के नए मध्यवर्ग के ऊपर की ओर तेजी से बढ़ते नए एकल परिवारों की सच्चाई है जिसमें बच्चों लिए समय नही है। और, अब हालात ये हैं करियर बना रहे लड़के-लड़कियों के एजेंडे में प्यार-विवाह-परिवार और बच्चों दूर-दूर नजर नहीं आते। नए युवक-युवतियों को अपने माता-पिताओं का परिवार और प्यार  मिला है, लेकिन वे अपने बच्चों को अपना परिवार नहीं दे सकते। वे संबंधों की वह उष्मा नहीं दे सकते जो कि बच्चों को मानसिक रूप से पुष्ट करती है, जो उसे जिदंगी भर ताकत और आत्म विश्वास देते हैं।

घर में परिवार में होकर भी बच्चों अनाथों की तरह, पराए बच्चों की तरह रहते हैं। महानगरों में एक तंग समय की, टाइट सी, अति स्पर्धमय जिंदगी नसीब हो रही है जो जमीन से ज्यादा आसमान में या कारों में बीतती है, मोबाइल की कनबतियों में बीतती है या फेसबुक पर बीतती है।अंतत: मोबाइल या फेसबुक एक नई कम्यूनिटी बनाते हैं। नई पीढ़ी, युवजन घर के भीतर किसी से निकटता करने की जगह एक ग्लोबल बेगाने स्पेस में से निकटता और संवाद बढ़ाते हैं। आज के बच्चों को अपने मुहल्ले के बारे में नहीं मालूम लेकिन कहीं साइबर स्पेस में अपना चेहरा दिखा रहे किसी अनजाने के बारे में बहुत कुछ मालूम रहता है।

यह नए किस्म का अकेलापन, जिसमें सब कुछ है लेकिन आदमी नहीं है। उसका अपना जीवन नहीं, उसकी कहानी सुनने वाला कोई नहीं है।वह एक खाली कठघरे की तरह किसी दूसरे अजाने कठघरे से बातें करता है, जैसे अपने आप से बात करता हो और उसे भी भूल जाता हो।

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