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नए राज्य : भावना भड़काने की राजनीति

सबसे पहले तो हमें यह ध्यान रखना होगा कि पोट्टि श्रीरामलु के आमरण अनशन के बाद हुई आंध्र प्रदेश बनने की घोषणा और तेलंगाना को लेकर राजशेखर रेड्डी के अनशन के संदर्भ में बहुत फ़र्क हैं। इसको थोड़ा शुरू से समझना होगा। अंग्रेज़ी शासन ने भारत का राज्यों में बंटवारा किसी तर्कसंगत आधार पर नहीं किया था। भारत पर उन्होंने इकट्ठा कब्ज़ा नहीं किया था, यह कब्ज़ा किस्तों में हुआ था।

उनके साम्राज्य के अन्त तक, भारत के कई हिस्से थे जिन पर उन्होंने अपना सीधा शासन स्थापित नहीं किया बल्कि राजाओं, महाराजाओं और नवाबों के माध्यम से उनको नियन्त्रण में रखा। इसका नतीजा था कि उनके जाने पर भारत के नक्शे में कई प्रशासनिक इकाइयां थी और कई ऐसे इलाके थे जहां पारम्परिक शासकों का राज कायम था।

अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ चले आज़ादी के आन्दोलन के कई पहलू थे जिनमें एक भाषा और एक संस्कृति के लोगों का इकट्ठा एक राज्य में रहने की इच्छा और राजाओं के सामंती शासन से छुटकारा पाने की उनकी प्रजा की प्रबल इच्छा भी शामिल थी। भाषा और संस्कृति के आधार पर राज्यों का निर्माण और अंग्रेज़ों और राजाओं द्वारा लोगों को विभाजित करने की तमाम नकली सीमाओं को दूर करने की मांगें केवल कांग्रेस पार्टी के ही नहीं बल्कि सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी, सबके ऐजेंडे में थी।

आज़ादी के बाद भी उन तमाम इलाकों को जोड़कर आंध्र प्रदेश का गठन नहीं किया गया जहां के लोग तेलुगू बोलते थे और एक दूसरे से मिलती-जुलती संस्कृति के भागीदार थे। एक ऐसे प्रदेश के गठन के लिये जिसमें इन तमाम लोगों को शामिल किया जा सके एक जन-आन्दोलन छेड़ा गया जिसमें सारी राजनैतिक और सामाजिक धाराओं के लोग शामिल थे। इसी आन्दोलन का एक हिस्सा, पोट्टि श्रीरामलु की वह भूख हड़ताल थी जिसका अंत इतने अफ़सोसानाक तरीके से हुआ। यह भी याद रखने वाली बात है कि विशाल आन्ध्र की मांग करने वाले आन्दोलन ने कभी भी दूसरे भाषा-भाषी लोगों का विरोध नहीं किया, दूसरे भारतीयों के खिलाफ़ नफ़रत पैदा करने की बात नहीं की।

लेकिन आज चंद्रशेखर रेड्डी की भूख हड़ताल के सवाल को लेकर जिस तरह से कांग्रेस के आला कमान ने उल्टे-सीधे फ़ैसले सुनाने का काम किया है उससे पूरे देश में ज़लज़ला आने का खतरा पैदा हो गया है। हर तरह के राज्य को स्थापित करने की मांग उठने लगी है- प्रशासनिक आधार पर, कबीलों के आधार पर, विशेष राष्ट्रीयता के आधार पर और जो सबसे ज्यादा खतरनाक है, धर्म के आधार पर (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का एक पुराना ‘सुझाव’ है कि जम्मू-कश्मीर का बंटवारा तीन हिस्सों में धर्म के आधार पर कर दिया जाये : हिन्दू-जम्मू, मुस्लिम-कश्मीर और बौद्ध-लद्दाख)।

राजनैतिक मौकापरस्ती के चलते यह समझदारी आम हो गई है कि भावनाओं को भड़काने की होड़ में जो सबसे आगे निकलेगा वही सबसे अधिक और सबसे जल्दी सफ़लता भी पा जायेगा। संसद में जसवंत सिंह का भाषण, जो समाचार पत्रों में पढ़ने को मिला, एक खतरनाक संकेत है। उन्होंने कहा कि गोरखा लोग बहुत राष्ट्रवादी हैं लेकिन अगर उनकी गोरखालैंड की जायज़ मांग को स्वीकारा नहीं गया तो फिर इसमें परिवर्तन भी हो सकता है। अगर भारत के नक्शे को देखा जाये कि गोरखालैंड की मांग उसके किस हिस्से को लेकर उठाई जा रही है और फिर उनके भाषण पर ग़ौर किया जाये तो स्थिति की गम्भीरता समङी जा सकती है।

अखबारों से यह भी पता चला है कि हैदराबाद में रेड्डी के अनशन के दौरान, उनके सुपुत्र ने कुछ मनों को मोहने वाले नारों की ईजाद की जिसकी वजह से उनकी जनप्रियता बहुत बढ़ गयी है। उन नारों में एक था- तेलंगाना जागो, आन्ध्र वालो भागो। अगर नये राज्यों को बनाने के आन्दोलन अन्य भारतीयों के प्रति नफ़रत फैलाएंगे तो काफ़ी भयावह स्थिति तैयार हो सकती है, तो आखिर कांग्रेस के आला कमान ने ऐसा किया ही क्यों जिससे आज उसकी पार्टी के लोग भी उसके किये के खिलाफ़ सांसद और मंत्रिपद से इस्तीफ़े दे रहे हैं?

ऐसे मौके पर जब संसद का सत्र चल रहा था तब उसने तमाम संसदीय पराम्पराओं को धता बताकर, बिना संसद की राय मांगे एकतरफ़ा ऐलान क्यों कर दिया? और वह भी एक ऐसा ऐलान जिसे वह खुद अब अपनाने को तैयार नहीं है? निश्चित तौर पर इन सवालों का जवाब लोगों को शासन करने वालों से मांगना होगा। हो तो यह भी सकता है कि आलू के दाम क्यों बढ़े, इसका जवाब देने में असमर्थ कांग्रेस अपनी करनी पर किये जाने वाले किसी भी सवाल का उत्तर देने की स्थिति में नहीं है।

लेखिका अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की अध्यक्ष हैं

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