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हिंसक या कोमल

एक चैनल पर दूसरे विश्व युद्ध पर कुछ दिखाया जा रहा है। मैं उखड़ कर कहता हूं कि ये लड़ाइयां कब तक दिखाते रहेंगे? मेरे दोस्त कहते हैं, ‘जब तक लड़ाइयां चलती रहेंगी।.. और ये कभी खत्म नहीं होंगी क्योंकि आदमी स्वभाव से हिंसक होता है।’ उसके बाद हम चाय पर लड़ते रहे। फिर अपने-अपने रास्ते चल दिए। 
 
अपने मानव विज्ञानियों की एक थ्योरी यह है कि आदमी बुनियादी तौर पर कबीलाई है। और एक हिंसक रुझान उसके भीतर दबा रहता है। जरा सा सभ्यता का परदा हटा और वह हावी होने लगता है। वे यह भी मानते हैं कि उस हिंसक रुझान की भूख मिटनी जरूरी है। और उसी भूख को मिटाने के लिए ही खेल ईजाद हुए। ठीक भी है लड़ाई की जगह खेल के मैदान पर ही वह भूख मिट जाए। लेकिन लड़ाई कहां खत्म हुई?

 यह मानने को मन नहीं होता कि आदमी स्वभाव से हिंसक होता है। वह प्रकृति से ही लड़ाका होता है। यह बेहद निगेटिव सोच है। और उससे आदमी के भले होने पर चोट लगती है। आदमी का बुनियादी रुझान हिंसक और निगेटिव है। इसे कोई अध्यात्मिक साधक कैसे मान सकता है? शायद इसीलिए यह सवाल बौद्ध गुरु दलाई लामा को भी परेशान करता रहा है। आदमी की संरचना को आधार बनाते हुए वह मानते हैं कि हिंसा उसका स्वभाव नहीं हो सकता। अपनी बात को साबित करने के लिए परमपावन हाथों का जिक्र करते हैं। वह अपने हाथ दिखाते हुए कहते हैं, ‘देखो, हाथ कितने कोमल हैं। अगर हमारे हाथ मारने के लिए ही होते, तो इन खूबसूरत उंगलियों की जरूरत ही नहीं होती।’
 
असल में उंगलियां किसीको मार नहीं सकतीं। वह तो कोमल ही होती हैं। मारने के लिए मुक्का बनाना पड़ता है। या कोई हथियार उठाना पड़ता है। मुक्का बनाना या हथियार उठाना दोनों ही सहज काम नहीं हैं। और बुनियादी होने की पहली शर्त सहज होना है। आदमी में जो भी सहज है, वही तो उसका स्वभाव है। दलाई लामा जोर देते हैं, ‘हमारे हाथों की संरचना ऐसी है कि वे मारने के बजाय गले लगाने के लिए ज्यादा अच्छे हैं।’ सचमुच दुनिया तो गले लगाने से ही आगे बढ़ी है। हिंसक ही होती तो और सिकुड़ जाती।

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