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लौहपुरुष का जाना

किसी भी राजनैतिक दल में नए नेतृत्व का आगे आना हमेशा ही स्वागतयोग्य होता है। इसलिए भी कि यह बदलाव का सूचक होता है और इसलिए भी कि इससे कई पुरानी जड़ताओं के टूटने की उम्मीद की जाती है। इस लिहाज से भारतीय जनता पार्टी में जो हो रहा है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन बात इतनी सीधी सरल है नहीं। इस समय भाजपा में जो बदलाव हो रहा है वह किसी नियमित प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है।
वह पार्टी के आला नेतृत्व के बीच पनपी तनाव की उस खटास का परिणाम है, जिसने पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद के अपनी जड़े जमानी शुरू कर दी थीं। और यह तनाव सिर्फ आला नेताओं के बीच का ही नहीं है, इसके एक सिरे पर पार्टी का संस्थापक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी खड़ा है, साथ ही अयोध्या के राम मंदिर से लेकर मुहम्मद अली जिन्ना समेत बहुत सारे ऐसे सवाल भी हैं जो पिछले कई साल में पार्टी के आधार में जमी टैक्टानिक प्लेट्स को हिलाकर अक्सर भूकंप पैदा करते रहे हैं। आज जब पार्टी अपने नेता लाल कृष्ण आडवाणी को लगभग अलविदा कह रही है तो इस विदाई के पीछे उन भूकंपों की गूंज भी सुनी जा सकती है।

विदाई की इस बेला तक लाल कृष्ण आडवाणी अटल बिहारी वाजपेयी के बाद पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। स्वास्थ्य खराब होने की वजह से वाजपेयी राजनीति में सक्रिय नहीं रह गए हैं और ऐसे में आडवाणी के नेपथ्य में चले जाने का पार्टी पर असर पड़ेगा ही। पार्टी की कमान अब जिन हाथों में पंहुची है वे दूसरी पांत के नेता हैं, और उन्हें पद संभालते ही रातोरात आडवाणी जैसी स्वीकार्यता और रुतबा मिल जाएगा यह उम्मीद नहीं की जा सकती। फिर आडवाणी भाजपा के ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने लंबे समय तक पार्टी को नेतृत्व दिया है बल्कि उसे बहुत नीचे से शिखर तक पंहुचाया भी है।

अयोध्या के राम मंदिर को लेकर निकाली गई उनकी रथ यात्रा को लेकर सहमतियां और असहमतियां हो सकती हैं लेकिन यह यात्रा ही वह प्रस्थान बिंदु थी जिसने भाजपा को राजपथ पर खड़ा कर दिया था। और इसी राजपथ से पार्टी जब सत्ता में पंहुची तो एक अनुशासित स्वयं सेवक की तरह आडवाणी ने सरकार में दूसरे नंबर के पद को बिना किसी हील हुज्जत के सहर्ष स्वीकार लिया था। और इसके पहले कि उनका नंबर आता बाजी पलट गई। वैसे अपने कैरियर का लंबा समय उन्होने विपक्ष में ही गुजारा, पर वे विपक्ष के ऐसे नेता तो थे ही जिस पर कोई भी लोकतंत्र गर्व कर सकता है।

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