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एक एजेंडा संसद के लिए

अगर केन्द्र और राज्य सरकारें देश के प्रमुख समाचार पत्रों में सम्पादक के नाम छपने वाले पत्रों में आई शिकायतों, समस्याओं और सुझावों पर सदन में चर्चा करवा लें और उन पर व्यवहारिक रूप से अमल करें तो देश की कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। ऐसा करने से सरकार जनता का मन (सोच) भली भांति समझ सकती है। और अनदेखे रह जाने वाले कई मुद्दों पर उसकी नजर भी जा सकती है।
देशबन्धु, एच-52, गली नं.-4, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली

समस्याएं बनी रहीं तो राज्य टूटेंगे ही
सरदार वल्लभ भाई पटेल इस देश की छोटी रियासतों को जोड़ कर एक पूर्ण भारत बनाए थे। आज उसी की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। देश के हर कोने से एक पृथक राज्य बनाने की आवाज आती है। इतिहास नहीं वर्तमान गवाह है कुछ वर्ष पहले झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ। जिस विकास की बात पर वहां सरकार गठन हुआ आज वह राज्य उस पायदान पर है, संभवत: नहीं। पलायन, बेरोजगारी आज भी जस की तस है।  जब तक विकास से वास्ता नहीं जोड़ेगी, राज्यों के टूटने का क्रम जारी रहेगा।
पवन कुमार झा, 56, सहिपुर, शालीमार बाग, नई दिल्ली

छोटे राज्य से भला नहीं
किसी भी राज्य से छोटे राज्यों के गठन से राज्य के नागरिकों का कोई भला होने वाला नहीं है केवल उस राज्य के शीर्ष नेताओं का ही भला होता है। छोटे राज्य न बनाकर उस क्षेत्र के विकास के लिए केन्द्र सरकार को विशेष अनुदान देकर विकास करना चाहिए।
दिनेश गुप्त ,कृष्णगंज, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश

पाबंदी क्यों नहीं
कई सालों से दिल्ली सरकार और एमसीडी दिल्ली को प्रदूषण मुक्त शहर बनाने के लिए कड़ी मशक्कत कर रही है। फिर भी दिल्ली की साफ सफाई का हाल जो है उससे आप सब परिचित हैं। दिल्ली में प्रदूषण का एक प्रमुख कारण पॉलीथीन थैलों का उपयोग है। दिल्ली में पॉलीथीन पर पाबंदी लगे लगभग 6-8 महीने हो चुके हें। फिर भी पॉलीथीन का उपयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है।
मनीष, मालवीय नगर, नई दिल्ली

शर्म आती है
लेकिन बेशर्म हुआ बैठा हूं
देश को बांट रहा हूं
खुद को देश का
बेटा कहता हूं।
वीरेन कल्याणी, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली

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