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कैग ने ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की बखिया उधेड़ी

कैग ने ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की बखिया उधेड़ी

केंद्र सरकार टीवी चैनलों पर विज्ञापन देकर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनएचआरएम) की सफलताओं के ढोल पीट रही है। लेकिन इसकी असलियत कुछ और है। गरीबों की दवा के लिए आवंटित धन से टीवी, फर्नीचर खरीद लिए गए। घटिया और महंगी दवाओं, टीकों की खुलेआम खरीद होती रही। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बिना बिजली के कोल्ड चेन उपकरण और आपरेशन थियेटर चलाए जा रहे थे तो यूपी में अस्पतालों में कहीं तबेले चल रहे थे तो बिहार में प्रसूति केंद्रों पर अनाज के गोदाम मिले।

शुक्रवार को संसद में पेश की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा उप केंद्रों को क्रमश 50, 25 तथा 10 हजार रुपये की राशि प्रदान की गई। 31 मार्च 2008 तक कुल 132 करोड़ रुपये इस मद में जारी किए गए। मकसद यह था कि इस राशि का इस्तेमाल ऐसी चिकित्सकीय जरूरत के लिए किया जाए जिसका रुटीन में प्रावधान नहीं होता है। लेकिन जांच में पता चला कि आठ राज्यों के अस्पतालों ने इस राशि का इस्तेमाल अस्पताल के फर्नीचर, टीवी, उपकरण, वाहनों के लिए पेट्रोल, स्टेशनरी आदि खरीदने में किया।

कैग ने कहा है कि 10 राज्यों में 216 स्वास्थ्य उप केंद्र, चार राज्यों में 19 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भवन के बिना ही चल रहे थे। 16 फीसदी उप केंद्र और 13 फीसदी पीएचसी जीर्ण-शीर्ण भवनों में चल रहे थे। दूसरी तरफ झारखंड के हजारीबाग जिले में एक उपकेंद्र में राशन डीलर द्वारा अनाजों के भंडारण किया जा रहा था। यहीं के साहेबगंज के बरहरवा पीएचसी के प्रसूति कक्ष में चिकित्सा स्टोर चल रहा था तथा प्रसूतियां सामान्य वार्ड में करायी जा रही थी।

इधर, यूपी की तरफ बढ़ें तो बांदा तथा इटावा जिलों के बड़ागांव तथा अकबरपुर में स्थित उप स्वास्थ्य केंद्र परिसरों का इस्तेमाल गांव वालों द्वारा जानवर बांधने के लिए किया जा रहा था। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रीसिया के चार वाडरे में से तीन का इस्तेमाल बैठक हाल के रूप में तथा टीकों के भंडार के रूप में किया जा रहा था। बाराबंकी जिले के पीएचसी सूरतगंज में कुष्ठ रोग अस्पताल चल रहा है। जबकि इटावा के पीएचसी जसवंत नगर में तहसील के कब्जे में है।

और क्या कहा है कैग ने
-मंत्रियों के मिशन स्टेयरिंग ग्रुप को प्रत्येक छह माह में एक समीक्षा बैठक करनी थी तथा इसकी रिपोर्ट साल में एक बार कैबिनेट को देनी थी। लेकिन चार साल में सिर्फ चार बैठकें हुई तथा कैबिनेट को सिर्फ एक बार रिपोर्ट दी गई।

-केंद्र हैल्थ मिनिस्ट्री आईसीआईसीआई बैंक के जरिये केंद्र से निधियों को राज्यों तक 24 घंटे के भीतर पहुंचाने में विफल रही। इसकी वजह बैंक की शाखाओं का राज्यों में विस्तार नहीं होना है। कैग ने कहा कि इस कार्य के लिए आईसीआईसीआई बैंक का चयन ही गलत था।

-प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कूड़ाघरों, प्रदूषित उद्योगों, गंदे पानी के निकट स्थित पाए गए जहां सफाई की भारी कमी थी। इनमें जैविक कचरे के प्रबंधन के कोई उपाय नहीं थे। इसलिए स्वास्थ्य केंद्र बीमारियां फैला रहे थे।

-बिहार समेत कई राज्यों में डायग्नोसिस सेवाओं की आउटसोर्सिग की जा रही है जिसे बंद करने की सिफारिश की गई है।

-देश के 50 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव किट नहीं थी। 23 फीसदी केंद्रों के पास ही नवजात शिशु देखभाल के उपकरण थे।

-68 फीसदी केंद्रों में मौजूद कोल्ड चेन प्रबंधन उपकरण कार्य नहीं कर रहे थे। इनका इस्तेमाल टीकों और महत्वपूर्ण दवाओं को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। वजह बिजली और जनरेटर नहीं होना।

-11 फीसदी पीएचसी बिना डाक्टर के चल रहे थे जबकि 77 फीसदी उप केंद्र सिर्फ एक मिडवाइफ से चल रहे थे जबकि दो की नियुक्ति का प्रावधान है।

-झारखंड में एक ऐसी कंपनियों से सवा छह करोड़ रुपये की दवा खरीदी गई जिसे गुजरात, राजस्थान तथा महाराष्ट्र सरकार ने घटिया दवा आपूर्ति करने के चलते प्रतिबंधित कर दिया था।

-हैल्थ मिनिस्ट्री ने दवाओं और टीकों की खरीद सरकारी दवा कंपनियों से नहीं की बल्कि ऐसी कंपनियों से टीके खरीदे गए जिन्हें दो साल उत्पादन करने का भी अनुभव नहीं था।

-गुजरात, हिप्र, केरल, पंजाब, उत्तराखंड तथा दिल्ली, उत्तर प्रदेश को 50 फीसदी गर्भवती महिलाएं को आयरन और फॉलिक एसिड की खुराक तक नहीं मिल पाई। पंजाब में 5.20 लाख गर्भवती महिलाएं पंजीकृत हुई लेकिन किसी को भी एक आयरन टेबलेट नहीं मिली।

-सिर्फ चार फीसदी पुरुष नसबंदी हुई। लेकिन खराब शल्य क्रिया के चलते दिल्ली, उप्र आदि में करीब 3074 आपरेशन फेल हो गए।

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