class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पीएम ने दिए कोपेनहेगन सम्मेलन के असफल होने के संकेत

पीएम ने दिए कोपेनहेगन सम्मेलन के असफल होने के संकेत

जलवायु परिवर्तन को लेकर कोपनहेगन में हो रही शिखर बैठक में कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाने के संकेतों के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बैठक के उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने की आशंका व्यक्त करते हुए शुक्रवार को यूएनएफसीसीसी के सिद्धांतों से किसी भी तरह का समझौता करने के प्रति आगाह किया।

मनमोहन ने शिखर बैठक के अंतिम और बेहद महत्वपूर्ण दिन अपने सम्बोधन में जोर देकर कहा कि भारत प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन में वर्ष 2020 तक साल 2005 की तुलना में करीब 20 प्रतिशत की कटौती का अपना स्वैच्छिक लक्ष्य प्राप्त करेगा, चाहे इस बैठक का नतीजा कुछ भी क्यों न हो।

दिन-ब-दिन खतरनाक होते पर्यावरण को बचाने के मकसद से एक समझौते पर आम राय बनाने के लिए यहां पहुंचे विश्व भर के नेताओं की मौजूदगी में मनमोहन ने कहा कि अगर जलवायु को लेकर सहयोगपूर्ण वैश्विक व्यवस्था बने तो हम उत्सर्जन में कटौती की दिशा में और काम कर सकते हैं।

मनमोहन ने कहा हो सकता है कि इसका (शिखर बैठक का) नतीजा हमारी उम्मीदों के अनुरूप नहीं हो। उन्होंने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वास्तविक रूप से वैश्विक और मौलिक रूप से सहयोगपूर्ण प्रतिक्रिया के वास्ते आगे भी बातचीत करने की हिमायत की।

मनमोहन ने कहा कि हमारे सामने एक मुश्किल काम है। मुझे उम्मीद है कि हम सकारात्मक और सृजनात्मक भूमिका अदा करेंगे ताकि हम अपने मतभेद दूर कर सकें और आने वाले वक्त में संतुलित तथा समानतापूर्ण नतीजे पर पहुंच सकें। भारत इसमें कहीं से भी पीछे हटता नजर नहीं आएगा।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि ज्यादातर देश यूएनएफसीसीसी के सिद्धांतों पर किसी भी तरह के पुनर्विचार या उसे खत्म करने के खिलाफ हैं। खासतौर पर कोई भी मुल्क साझा मगर भिन्नतापूर्ण जिम्मेदारियों के सिद्धांत से किसी तरह का समझौता नहीं चाहता। उन्होंने कहा कि हमारी समझ से इस सम्मेलन से नतीजे के रूप में संकुचित उम्मीद और संकुचित अमल निकलने से दुनिया में बहुत बुरा संदेश जाएगा।

मनमोहन ने कहा कि कोपनहेगन शिखर वार्ता की कामयाबी से भारत का बड़ा सरोकार है क्योंकि भविष्य में उसका जलवायु परिवर्तन के सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव सहन करने वाले देशों में शुमार किए जाने की आशंका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भविष्य में क्योटो प्रोटोकॉल और बाली कार्ययोजना के आधार पर बातचीत जारी रहनी चाहिए। साथ ही क्योटो प्रोटोकॉल के सभी पक्षकार देशों को उत्सजर्न में कटौती करने के अपने संकल्पों पर अमल करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि क्योटो प्रोटोकॉल का एक वैध कानूनी आधार का दर्जा बरकरार रहना चाहिए। अगर हमने इसके स्थान पर नए और कमजोर संकल्पों के आगे समर्पण किया तो यह अंतरराष्ट्रीय जनमत के खिलाफ होगा।

विकसित देशों पर उत्सर्जन में कटौती के लिए कानूनी बाध्यता के प्रावधान वाले क्योटो प्रोटोकॉल की वैधता अवधि वर्ष 2012 में खत्म हो रही है। मनमोहन ने कहा कि यहां मौजूद हर व्यक्ति यह मानता है कि जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा वे देश प्रभावित हैं जो इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। उन्होंने अफ्रीका के कई देशों तथा कम विकसित और छोटे द्वीपीय मुल्कों के साथ हो रही नाइंसाफी खत्म करने की जरूरत पर भी जोर दिया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि कोई भी समझौता विकासशील देशों की विकास और तरक्की की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा जलवायु से सम्बन्धित किसी भी व्यवस्था के पास सिर्फ एक नैतिक अधिकार और विश्वसनीयता होगी। वह भी तभी होगा जब वह इस बात को माने कि दुनिया के पर्यावरण पर हर नागरिक का समान अधिकार है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पीएम ने दिए कोपेनहेगन सम्मेलन के असफल होने के संकेत