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सम्मेलन बचाने डेनमार्क का मसौदा, 100 अरब की मदद शामिल

सम्मेलन बचाने डेनमार्क का मसौदा, 100 अरब की मदद शामिल

जलवायु सम्मेलन को सफल बनाने की अंतिम तिकड़म के तहत डेनमार्क सरकार समक्षौते का एक ऐसा मसौदा लेकर आई है जिसमें उत्सर्जन कटौती के लिए विकसित देशों पर अधिक जिम्मेदारी नहीं डाली गई है, लेकिन 2020 तक विकासशील देशों को 100 अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय मदद देने का वायदा किया गया है।

चर्चा के दौरान इस मसौदे में कई परिवर्तन हो सकते हैं। इसमें भारत की यह मुख्य मांग क्षलकती है कि सिर्फ ठोस अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मदद के विषय पर ही चर्चा होगी। यहां भारतीय टीम के साथ गहन विचार विमर्श कर चुके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह स्पष्ट कर चुके हैं कि विकासशील देशों की गरीबी को दूर किए बिना जलवायु परिवर्तन की समस्या से नहीं निपटा जा सकता।

सम्मेलन में शामिल हो रहे विश्व नेताओं में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भी शामिल हैं।

भारत की स्थिति के अनुरूप दस्तावेज में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को स्थिर किए जाने से पहले वैश्विक तापमान वद्धि को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए।

जलवायु परिवर्तन को लेकर हो रही वार्ताओं में मतभेदों के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विभिन्न उपायों पर आम सहमति के क्षेत्र चुनने तथा बाली कार्य योजना में शामिल विकासशील देशों को वित्तीय सहायता तथा हरित प्रौद्योगिकी हस्तांतरित करने का संदेश लेकर गुरुवार देर रात यहां पहुंच गए।

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 110 से अधिक वैश्विक नेताओं से मुलाकात से पहले सिंह अपने चीनी समकक्ष वेन जियाबाओ से मिलेंगे ताकि वे विकासशील देशों की स्थिति को मजबूत कर सकें। समझा जाता है कि शुक्रवार को संपन्न होने जा रहे 12 दिवसीय 15वां कान्फ्रेंस ऑफ पार्टीज में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए राजनीतिक बयान देने के बजाय तत्काल कदम उठाने की जरूरत पर जोर देते हुए एक संक्षिप्त पत्र जारी किया जाएगा। इससे एक ऐसा आधार बन सकता है जो भविष्य में कानूनी तौर पर बाध्यकारी एक समझौता तैयार कर सकेगा।

इस सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, ब्रिटिश प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन, फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सारकोजी सहित 110 वैश्विक नेताओं के भाग लेने की उम्मीद है।
 विकासशील देश क्योटो प्रोटोकाल को दरकिनार किए जाने की अमीर देशों की कोशिश का विरोध कर रहे हैं।

क्योटो प्रोटोकाल औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य तय करती है। औद्योगिक देशों की ओर से वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित किए जाने और 2050 तक उत्सर्जन में 80 प्रतिशत तक की कटौती किए जाने तथा विकासशील देशों से उत्सर्जन कटौती के लिए कड़े कदम उठाए जाने की बात कहे जाने की उम्मीद है।

चार देशों भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के समूह (बेसिक) द्वारा इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किए जाने की उम्मीद है, क्योंकि इसमें जलवायु परिवर्तन से संबंधित यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन, बाली एक्शन प्लान और क्योटो प्रोटोकाल का कोई उल्लेख नहीं है।

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