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बदल रहा है भय का बाजार

बदल रहा है भय का बाजार

हॉलीवुड के मुकाबले बॉलीवुड में हॉरर फिल्में काफी कम बनती हैं। इसकी एक बड़ी वजह वहां के मुकाबले हमारे स्पेशल इफेक्ट्स, डर से संबंधित विभिन्न विषय और काफी हद तक वो ट्रीटमेंट भी है, जो हॉरर फिल्मों के निर्माण के लिए जरूरी माना जाता है। बॉलीवुड की किसी हॉरर फिल्म में हिंसा, खून-खराबा और उत्तेजक दृश्यों का मीटर जरा सा भी आगे बढ़ा तो फिल्म सेंसर में अटक जाती है और आपत्तिजनक दृश्यों की काट-छांट के बाद ही रिलीज होती है, जबकि हॉलीवुड की ‘हॉस्टल’, ‘सॉ’, ‘हिल्स हैव आईज’, ‘चेनशॉ मस्कारा सिरीज’ सरीखी सिरीज में गला काटने से लेकर न्यूड और सेमी न्यूड दृश्यों की भरमार रहती है।

यहां हॉलीवुड के मशहूर दिग्गज और हॉरर फिल्मों के सौदागर अल्फ्रेड हिचकॉक की फिल्मों को अलग से शामिल करना चाहिये, क्योंकि उन्होंने अपनी फिल्मों में डर के एक नए आयाम को जन्म दिया और चिड़ियों-कौओं (दि बर्डस) तक से लोगों को डराया। ‘सायको’ में अल्फ्रेड ने एक ऐसे पागल खूनी को स्कैच किया, जिसने अमेरिकियों की रातों की नींद हराम कर दी। अल्फ्रेंड की फिल्मों में खून के फव्वारे नहीं होते थे। बॉलीवुड के रामसे ब्रदर्स की हॉरर फिल्मों की तरह रेन डांस और उत्तेजक दृश्य भी नहीं। अल्फ्रेड की तवज्जो डरावने चेहरों से अधिक उस माहौल को क्रिएट करने में रहती थी, जिससे लोगों में दहशत पनपे। हॉरर फिल्म के जरिये जापानी और कोरियाई फिल्मकार हमेशा से दर्शकों का मनोरंजन करते रहे हैं। उनका लोहा हॉलीवुड भी मानता है। ‘दि ग्रज’ और इसके सीक्वल के अलावा ‘दि रिंग’ के सीक्वल तथा ‘प्लस’,  ‘ऑडिशन’, ‘अकीरा’ सरीखी जापानी डरावनी फिल्में दुनियाभर में देखी जाती हैं। इसी प्रकार कोरियाई हॉरर फिल्मों में ‘ए टेल ऑफ टू सिस्टर्स’, ‘रेड आई’, ‘इन टू दि मिरर’, ‘समवन बिहाइंड यू’ और ‘सडनली एट मिडनाइट’ सरीखी फिल्मों ने हॉलीवुड तक खूब धूम मचाई है। बेशक इन फिल्मों का ट्रीटमेंट रामसे ब्रदर्स सरीखा नहीं था।

इधर, डर और दहशत के इस अथाह बाजार को भुनाने में बॉलीवुड के नए-पुराने फिल्मकार अब पीछे नहीं हैं। भय के बढ़ते बाजार के साथ उसमें सफलता पाने के नुस्खे नए फिल्मकारों के पास हैं, जिसे वह कॉरपोरेट कल्चर की मदद से पूरा करने में जुटे हैं। हालांकि रामसे ब्रदर्स इस रेस से बाहर हो चुके हैं, लेकिन उनकी जगह अब रामू यानी राम गोपाल वर्मा ने ले ली है। बीते तीन दशकों में रामसे से रामू तक बॉलीवुड फिल्मों में हॉरर का बाजार काफी बदल गया है। पहले हॉरर फिल्में सी ग्रेड श्रेणी में आती थीं और दस में से महज कोई एक या दो फिल्म ही अच्छा बिजनेस कर पाती थीं, पर अब ऐसा नहीं है। अल्फ्रेड की तरह रामू ने भी एक कौए (फूंक) से करोड़ों कमाए, जबकि उनके सामने मल्लिका सहरावत (मान गये मुगले-आजम) थीं। इसमें कोई दो राय नहीं कि 2003 में जिस ‘भूत’ फिल्म से उन्होंने इस ट्रैंड को बदलने की कोशिश की, उसे वह ‘वार्निग’ और ‘अज्ञात 2’ से जारी रखने जा रहे हैं। भय के बदलते प्रतीक पर नजर दौड़ाएं तो पिछली कुछ हॉरर फिल्मों में सेक्स सीन तो क्या गीत तक नहीं थे। रेन डांस तो छोड़िये फिल्म की अभिनेत्रियां भी नॉन ग्लैमरस छवि में थीं। चीख पुकार थी, लेकिन आत्मा और भुतहा चेहरों के नाम पर कंबल ओढ़े आदमकद शैतान नहीं थे, जिन्हें रामसे ब्रदर्स ने सत्तर के दशक में श्याम रामसे, कुमार रामसे, केशु रामसे, तुलसी रामसे और किरण रामसे की टीम ने जन्म दिया था। इस बदलाव ने तो हॉरर फिल्मों से कॉमेडियनों की छुट्टी ही कर दी, जो भय से रिलीफ देने का काम करते थे और ज्यादातर समय फूहड़ कॉमेडी परोसते थे। बेशक उस दौर में रामसे ब्रदर्स ने ‘दरवाजा’, ‘दहशत’, ‘होटल’, ‘पुराना मंदिर’, ‘तहखाना’, ‘सामरी’, ‘वीराना’, ‘शैतानी इलाका’ आदि फिल्मों से एकछत्र राज किया, लेकिन आज के कॉरपोरेट कल्चर ने हॉरर फिल्मों के पैमाने बदल दिये हैं, जिसके बारे में हम बाद में बात करेंगे। पहले एक नजर हॉरर फिल्मों के सेंसर में अटकने वाली वजहों पर।

सेंसर का पहरा
अभिनेता राहुल बोस की एक फिल्म का प्रोमो इन दिनों सेंसर में ए सर्टिफिकेट के कारण अटका हुआ है। फिल्म का निर्माण आईड्रीम्स प्रोडक्शन द्वारा किया गया है और इसके निर्देशक हैं सजीत वारियर। राहुल के साथ इस फिल्म में ब्रिटिश सुपर मॉडल मिलित्जा रादमिलोविक हैं। फिल्म का नाम है ‘फायर्ड’। जाहिर है कि उपरोक्त पंक्तियों से यह साफ नहीं होता कि आखिर सेंसर इस फिल्म को ए सर्टिफिकेट क्यों दे रहा है। ‘फायर्ड’ एक हॉरर फिल्म है। तो क्या यह पहली फिल्म है, जिसे सेंसर ए सर्टिफिकेट दे रहा है। इस फिल्म में राहुल और मिलित्जा के सेमी न्यूड दृश्य हैं। हॉरर फिल्मों में रेन डांस, बलात्कार और उत्तेजक दृश्य तो रामसे ब्रदर्स के जमाने से चले आ रहे हैं। तो फिर इसमें नया क्या है और फिल्म के प्रोमो को क्लियरेंस न मिलने से राहुल क्यों परेशान हैं। हाल ही में इस फिल्म के संबंध में राहुल द्वारा दिये गये एक बयान पर नजर डाली जाए। बकौल राहुल बोस, ‘दर्शकों के लिए सुकून की बात यह है कि मैंने फिल्म में न्यूड सीन नहीं दिया है। वैसे भी मैं किसी भी तरह की सेंसरशिप के पक्ष में नहीं हूं। किसी भी हॉरर फिल्म में हिंसा, खून, उत्तेजक दृश्य होना आम बात है।’ क्या ‘फायर्ड’ के निर्देशक सजीत को यह नहीं पता था कि फलां दृश्य की वजह से यह फिल्म सेंसर में अटक सकती है या फिर सस्ते प्रचार की वजह से उन्होंने इस सीन को फिल्म में डाला। ‘फायर्ड’ के निर्माता, निर्देशक औेर अभिनेता जोर देकर कह रहे हैं कि जिन चीजों पर आपत्ति जताई जा रही है, वे सब फिल्म के जरूरी पहलू हैं। उनकी बात सही भी हो तो यह पहलू रामू ने अपनी किसी फिल्म में क्यों नहीं अपनाए। उनकी फिल्म ‘डरना जरूरी है’ में तो मल्लिका सहरावत थीं। विक्रम भट्ट भी तो ‘राज’ के सीक्वल में ऐसा कर सकते थे। उनके पास तो ‘जिस्म’ की तारिका बिपाशा बसु थीं। सजीत को यह समझना चाहिये कि अब हॉरर फिल्मों को सेक्स की चाशनी में परोसने के दिन गुजर गये। दर्शक अब भय के नाम पर कुछ नया चाहता है।     

क्योंकि डर सबको लगता है
1989 में ‘शिवा’ बनाने के बाद किसी ने नहीं सोचा था कि रामू तीन साल बाद ‘रात’ जैसी हॉरर फिल्म लेकर आएंगे।  रेवती और ओमपुरी द्वारा अभिनीत फिल्म ‘रात’ देखने के लिहाज से आज के दौर की फिल्म लगती है, पर यह फिल्म बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई। रामसे ब्रदर्स के भूत और चुड़ैल देखने के आदी दर्शकों ने रामू के न दिखने वाले शैतानी साये को पसंद नहीं किया। बढ़िया फोटोग्राफी, कैमरावर्क और अभिनय भी किसी के गले नहीं उतरा। इसके बाद रामू ने फिर कभी हॉरर की गली में नहीं झांका। पर 10-11 साल बाद न जाने उन्हें क्या हुआ और उन्होंने 2003 में ‘भूत’ का निर्माण किया। अजय देवगन, उर्मिला मातोंडकर, रेखा और नाना पाटेकर जैसे सितारों वाली यह फिल्म हिट साबित हुई। मेकिंग की अगर बात करें तो ‘रात’ और ‘भूत’ में कोई ज्यादा फर्क नहीं था। रामू ने खुद इसे ‘रात’ का रीमेक कहा। ‘भूत’ से महज एक साल पहले यानी 2002 में विक्रम भट्ट ने ‘राज’ बनाई थी। ‘भूत’ और ‘राज’ दोनों हॉरर फिल्में थीं, लेकिन दोनों में सिवाय एक आत्मा के प्रतिशोध के अलावा किसी तरह की कोई समानता नहीं थी। रामू ने तो ‘भूत’ की सफलता को भुनाना बेहतर नहीं समझा, लेकिन विक्रम भट्ट इससे नहीं चूके और उन्होंने ‘राज : दि मिस्ट्री कॉन्टीन्यूज’ का निर्माण कर डाला, जो इस साल पहली हिट मूवी रही। खैर, हॉरर फिल्मों के सीक्वल की लिस्ट अब बढ़ रही है। रामू की ‘फूंक 2’ का निर्माण तेजी पर है। वह ‘अज्ञात’ का सीक्वल भी बना रहे हैं।  इसके अलावा वह रितेश देशमुख को लेकर एक 3डी हॉरर फिल्म ‘वार्निंग’ भी बना रहे हैं।

विक्रम भट्ट ‘1920’ का सीक्वल और ‘शापित’ जैसी हॉरर फिल्म बना रहे हैं।  इसी साल आयी ‘13 बी’ नए हॉरर ट्रैंड को व्यक्त करने के लिए काफी है। आर. माधवन द्वारा अभिनीत एक अपार्टमेंट पर केन्द्रित इस फिल्म का निर्देशन युवा फिल्मकार विक्रम कुमार ने किया था, जो अब इसका सीक्वल यानी ‘13 बी 2’ बना रहे हैं। रोचक तथ्य है कि ‘13 बी’ पहली ऐसी भारतीयफिल्म है, जिसके रीमेक के लिए हॉलीवुड स्टूडियो ने बिग पिक्चर्स से संपंर्क किया और इसके राइट्स मांगे। तो उधर, संगीत सीवन जैसे प्रतिभाशाली निर्देशक भी हॉरर में हाथ आजमाते दिख रहे हैं। श्रेयास तलपड़े को लेकर वह ‘क्लिक’ जैसी हॉरर फिल्म बना रहे हैं। निर्देशक शैलेन्द्र सिंह एक साथ दो हॉरर फिल्में बना रहे हैं। उनके पास ‘8’ और ‘गर्र’ का निर्देशन है।

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