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जौनपुर की कंचन ने बिहार में फहराया परचम

वह शब्द हमारे पास नहीं, गुणगान आपका कर पायें। वह तार नहीं स्वर वीणा में, जो गीत आपके गा पायें’।। भारत के पहले राष्ट्रपति व देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पर यह पंक्तियां किसी लेखक या कवि ने नहीं, बल्कि टीडी कालेज की राजनीति विज्ञान से एमए पास छात्र कंचन मिश्र ने लिखी हैं। इन पंक्तियों की बदौलत ही कंचन के लेख को पूरे भारत से आये लेखों में सर्वश्रेष्ठ चुना गया।

बिहार के राज्यपाल व मुख्यमंत्री ने प्रथम राष्ट्रपति पर लिखे इस सर्वश्रेष्ठ लेख के लिए कंचन को 50 हजार रुपये का चेक व प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया। कमला नगर कालोनी हुसेनाबाद निवासी अशोक कुमार मिश्र के घर जन्म लेने वाली कंचन मिश्र ने 2 मार्च 2009 को अखबार में विज्ञापन पढ़ा कि, देशरत्न भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की 125 वीं जंयती पर राष्ट्रीय लेख, पेंटिंग व पोस्टर की प्रतियोगिता आयोजित की गयी है। यह प्रतियोगिता विद्यालय, महाविद्यालय व पेशेवर स्तर पर होनी थी। कंचन ने भी 2000 शब्दों के 22 पन्नों का लेख लिखकर कला संस्कृति एवं युवा विकास संग्रहालय पटना, बिहार भेज दिया। कंचन को पूरी उम्मीद थी कि, उसके लेख को निश्चितरूप से कोई न कोई पुरस्कार अवश्य मिलेगा। रोज-रोज अपने लेख को लेकर उत्साहित कंचन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब 30 नवम्बर 2009 को बिहार से फोन आया कि, आपके लेख को पूरे भारत के कोने-कोने से आये लेखों में सर्वश्रेष्ठ चुना गया है। सबसे पहले कंचन ने यह खुशखबरी अपने दादा रामदवर मिश्र को दी। पिता के साथ बिहार जाकर 3 दिसम्बर को बिहार के राज्यपाल देवानंद कुंवर, मध्य प्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों कंचन ने 50 हजार रुपये का चेक व प्रमाणपत्र प्राप्त किया। लौटकर आने के बाद गुरुवार को कंचन ने ‘हिन्दुस्तान’ से वार्ता की।


कंचन ने बताया कि, जिस समय वह महान विभूतियों के हाथों सम्मानित हो रही थी, उन्हें अपार प्रसन्नता हुई। उन्होंने बताया कि, डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक खुद्दार इंसान थे। उदार प्रवृत्ति के थे। गांधीवादी जीवन से ओत-प्रोत थे। राष्ट्रपति रहते हुए भी उनकी पत्नी स्वयं उनके लिए खाना बनाती थीं। यह सब बातें अपने लेख में लिखकर तो भेजा ही था। साथ ही यह भी लिखा था कि, ‘मुश्किलों से जो डरते हैं जलीलेखार होते हैं, बदल दे वक्त की तकदीर वे खुद्दार होते हैं’ इन्हीं सब कोटेशन को संज्ञान में लेकर उनके लेख को सर्वश्रेष्ठ लेख का खिताब प्रदान किया गया। कंचन इस सफलता के पीछे अपने शिक्षक पिता को पूरा श्रेय देती हैं।

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