class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

शहादत की याद में

इस्लामिक कैलेण्डर का नव-वर्ष ‘मुहर्रम’ के महीने से शुरू होता है। लेकिन इसे मनाने का अंदाज़ कुछ जुदा है। इस अवसर पर विश्व के सारे मुसलमान चाहे वह शिया हो या सुन्नी, अपने रंज व ग़म का इज़हार करते है। दरअसल यह रंज व गम का इज़हार इमाम हुसैन की शहादत की याद में किया जाता है, जिसने न सिर्फ अपने जाने-अज़ीज़ की कुर्बानी दी, बल्कि अपने कुनबे के लोगों तक को कटवा दिया।

किसी शख्स की मज़लूमाना शहादत पर उसके अहले खानदान का और उस खानदान से मुहब्बत व अकीदत या हमदर्दी रखने वालों का इज़हारे ग़म करना तो एक फितरी बात है। ऐसा रंज व ग़म दुनिया के हर खानदान और इससे संबंध रखने वाले की तरफ से ज़ाहिर होता है, इसकी कोई अखलाकी क़दर व क़ीमत इससे ज्यादा नहीं है कि उस शख्स की ज़ात के साथ उसके रिश्तेदारों और खानदान के हमददरें की मुहब्बत एक फि़तरी तक़ाज़ा है।

इस्लामी साल का यह मुबारक महीना ‘मुहर्रम’ कई अर्थों में दूसरे महीनों से अफज़ल है। बहुत से अहम घटनाएं भी इस ऐतिहासिक दिन से वाबस्ता है: एक तो हज़रत नूह इसी दिन किश्ती से ‘कोहे-जोदी’ पर उतरे तो उन्होंने अल्लाह का शुक्र अदा करने की गर्ज़ से खुद भी रोज़ा रखा और अपने साथियों को भी रोज़ा रखने का आदेश फ़रमाया। दूसरे, अल्लाह ने हज़रत आदम और हजरत यूनूस के शहर के बाशिंदों की तौबा इसी रोज़ कबूल फरमाई। तीसरे, हज़रत मूसा और आपकी क़ौम को फि़रऑन के ज़ालिमाना पंजे से इसी दिन रिहाई मिली और फिरऑन समुन्दर में डूब कर मर गया। चौथे, हज़रत ईसा की पैदाईश इसी दिन हुई और उन्हें आसमान पर इसी दिन उठाया गया। पांचवें, इसी रोज़ हज़रत यूसूफ को कुनबे से निकाला गया। छठे, हज़रत अयूब इसी रोज़ सेहतयाब हुए। सातवें, इसी दिन इदरीश को आसमान पर उठाया गया। आठवें, हज़रत इब्राहीम इसी दिन पैदा हुए। नवें, हज़रत सुलेमान को इसी दिन मुल्क बख्शा गया। दसवें, इसी दिन हज़रत इमाम हुसैन और आपके जान-निसार साथी हक़ की लड़ाई में शहीद हुए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:शहादत की याद में