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छत्तीसगढ का इतिहास जल संपदा से परिपूर्ण रहा है

आइए आज 2000 में बने छोटे से राज्य छत्तीसगढ़ की यात्रा करते हैं। छत्तीसगढ़ नदियों व जलसंपदा से परिपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में नदियों का अपना विशिष्ट इतिहास और महत्व है। उनसे मनुष्य का संबंध, मां के रूप में, सदैव श्रद्धा और आदर का पात्र रहा है। इन्ही नदियों को देखने-समझने के लिए यहां की यात्रा की।

यहां की गंगा कही जाने वाली महानदी, बस्तर की भाग्य विधाता इंद्रावती, सदानीरा शिवनाथ, खारून, रेण, अरपा, पैरी, जोंक, हसदो, माड, ईव, कैलो, शबरी, नारंगी, शंखिनी, डंकनी, कोतरी, संकरी, मनियारी, मंदगा और गोदावरी आदि ऐसी अनेक नदियां हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ की भूमि को उर्वरा बनाया और वहां की संस्कृति में विविध रंग भरे।

इस राज्य को धान का कटोरा कहा जाता है और इसे यह नाम देने में यहां की नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है जिन्होंने धान की फसल को भरपूर पानी दिया। महानदी भारत की महान नदियों में से एक है और उसका अपना अलग पौराणिक, आध्यात्मिक, व्यापारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक इतिहास है। महानदी को पहले चित्रोलला गंग भी कहा जाता था। इसके अलावा वायु पुराण में इसे नीलोत्पला भी कहा गया है। इस नदी का उद्गम स्थल सिंहावा पर्वत श्रेणियों में समुद्र सतह से 434 मीटर ऊपर स्थित है।

प्राचीन संदर्भ बताते हैं कि महानदी में बहुमूल्य खनिज पदाथरें का भंडार छिपा है। पुरातत्वविदों का अनुमान है महानदी के दूसरे तट पर यदि उत्खनन की श्रंखला चलाई जाए तो वहां हीरों का भंडार मिल सकता है। देवभोग में मिले हीरे के भंडार इस बात की पुष्टि भी करते हैं।

छत्तीगसढ़ का बस्तर क्षेत्र भी छोटी बडी़ नदियों का समूह रहा है। इंद्रावती यहां की प्रमुख नदी है और इसे बस्तर की जीवन रेखा माना जाता है। इंद्रावती पडो़सी राज्य उडी़सा के कालाहांडी के धुआसल रामपुर पर्वत से निकलती है। पुराणों में तीन मंदाकिनी नदियों का उल्लेख मिलता है। पहली स्वर्ग की गंगा, दूसरी चित्रकूट की मंदाकिनी और तीसरी इंद्रावती। इंद्रावती के जल प्रपातों में चित्रकूट, तीरथगढ़, मेंदरीघुमर, चित्रधारा, कुकुरघूमर, दाबाडा़, गुप्तेश्वर झरना पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्र हैं।

छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी का भी अपना एक अलग इतिहास है। कहा जाता है कि यह एक ऐसी नदी है जिसका जल कभी नहीं सूखता है और इसीलिए इसे सदानीरा भी कहा जाता है। यह नदी एक तरह से दक्षिणी छत्तीसगढ़ के पूरे जल का संग्रहण कर उत्तरी हिस्से को सौंप देती है।

इस दृष्टि से देखें तो पूरे छत्तीसगढ़ में नदियों का जाल बिछा हुआ है। लेकिन औद्योगीकरण और इसके साथ ही बढ़ते प्रदूषण ने इन नदियों के स्वरूप और उनकी स्वच्छ जल संग्रहण क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। नदियों की जल संपदा से भरे-पूरे इस राज्य को अपनी नदियों के संरक्षण की दिशा में जरूर महत्वपूर्ण पहल करनी चाहिए।

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