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मुंह में पानी लाएं मोमोज

मुंह में पानी लाएं मोमोज

तो बात यमुनापार से शुरू की जाए। अक्सर सुनने में आता है कि बाकी दिल्ली के मुकाबले यहां न तो नामी रेस्तरां (कुछेक शॉपिंग मॉल्स को छोड़ कर) हैं और जायके के फेमस ठिकाने भी काफी कम हैं। साउथ, वेस्ट और नॉर्थ दिल्ली के मुकाबले यहां के लोग उतने फूडी नहीं हैं। हालांकि पुरानी दिल्ली के लोगों के चटोरेपन की तुलना तो शायद ही किसी इलाके के लोगों से की जा सके, पर रोचक तथ्य यह है कि यमुनापार में रहने वाली अधिकतर आबादी पुरानी दिल्ली से पलायन की ही देन है। यानी जबान का चटोरापन यमुनापार में भी तकरीबन वही है, जो दिल्ली 6 में देखने को मिलता है। इसकी एक बड़ी मिसाल यहां शाम होते ही सजने वाले मोमोज बाजार से मिलती है।

अब जरा रुख विकास मार्ग (लक्ष्मी नगर मेन रोड, दोनों साइड) की ओर करते हैं। शाम के यही कोई चार बजने को हैं। सड़क के बीचोबीच मेट्रो का काम चल रहा है, इसलिए दोनों तरफ की पटरियों पर कारों, दो पहिया वाहनों और रिक्शे ठेले वालों के बीच अगर आप देखेंगे तो एक छोटे से स्टूल पर हीटर या स्टोव पर रखे एल्यूमिनियम के बड़े से बर्तन के साथ सजी मोमोज की दुकानें सहज ही दिखने लगेंगी। कागज की प्लेट में सूखी लाल मिर्च की तीखी चटनी के साथ परोसे जाने वाले मोमोज के धंधे में तामझाम की चिंता दुकानदारों को नहीं है। महज दो बाई दो या तीन बाई चार फुट की जगह में वनमैन वनस्टैंड की तरह है मोमोज का धंधा, जिसके लिए किसी खास ट्रेनिंग की भी जरूरत नहीं है। इसे जायका कहिये या चस्का, लेकिन बीते एक-दो वर्षो में मोमोज ने चटोरे दिल्लीवालों की जबान पर अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन (निर्माणाधीन) से थोड़ा आगे चलें तो मोमोज का पहला ठीया दिखाई देगा। इसे जीवन चलाता है, जो काम-काज की तलाश में एक साल पहले दिल्ली आया था। वह बताता है, ‘राधू पैलेस के सामने वाली एक गली में मैंने एक दिन मोमोज खाया। अच्छा नहीं लगा, पर चटनी बढ़िया थी। सौदा सस्ता था, पर खाने में नहीं जंचा। पर न जाने क्यों जब भी मैं उधर से निकलता तो एक प्लेट मोमोज खा लेता। एक-दो महीने में कई बार खाए और मोमोज मुझे अच्छे लगने लगे। बस फिर मैंने भी अपना एक छोटा ठीया लगा लिया। वैसे ये मेरी पार्ट टाइम जॉब है।’ जीवन की ही तरह इस सड़क पर छोटे-छोटे ठीयों पर मोमोज बेचना कई लोगों का पार्ट टाइम जॉब है। इसी सड़क पर हीरा स्वीट के पास मोमोज बेचने वाले एक दुकानदार के पास ग्राहकों से निपटने के लिए शाम को फुरसत नहीं होती।

न केवल विकास मार्ग मेन रोड पर, बल्कि लक्ष्मी नगर की अंदर की गलियों में भी शाम को मोमोज बेचने वालों के झुरमुट आसानी से देखने को मिल जाएंगे। प्रीत विहार, विवेक विहार, दिलशाद गार्डन से होते हुए यमुना विहार तक में मोमोज खूब बिक रहे हैं। इधर कनॉट प्लेस इलाके में जनपथ, शंकर मार्केट, शिवाजी स्टेडियम, बंगाली मार्केट में बिकने वाले मोमोज के रेट थोड़े से ज्यादा हैं और क्वालिटी भी बेहतर है। मोमोज ने पुरानी दिल्ली में दस्तक दे दी है। हौज काजी, बाजार सीताराम, किनारी बाजार, चांदनी चौक की कुछेक गलियों के अलावा अब यह शाम के समय मटिया महल जैसे बाजारों में भी पहुंच रहा है। हालांकि मटिया महल में बड़ों के मुकाबले बच्चों इसे ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इसके अलावा पश्चिमी दिल्ली के विभिन्न इलाकों, जैसे तिलक नगर, जनक पुरी, सुभाष नगर, राजौरी गार्डन, मोती नगर, कर्मपुरा, पंजाबी बाग के साथ-साथ साउथ दिल्ली में मुनीरका, आर.के. पुरम, गढ़ी, साउथएक्स सरीखे बाजारों में तो मोमोज पहले से ही मशहूर हैं। राजधानी के विभिन्न इलाकों में मोमोज की बढ़ती पैठ ने चाउमिन यानी नूडल्स को काफी पीछे छोड़ दिया है। दिल्लीवाले अस्सी के दशक में जिस चाउमिन के क्रेजी थे और नब्बे के शुरुआती दौर तक आते-आते इसे दीवानगी की हद तक चाहने लगे थे, दिल्ली को अब मोमोज आखिर क्यों इतना पसंद आ रहा है, जबकि चाउमीन तो रेस्तरां, होटलों, गली-कूचों से निकल शादी-ब्याह के पंडालों तक जा पहुंची है? रोचक तथ्य ये भी उभरा है कि मोमोज को पसंद करने वालों में कोई एक खास तबका शामिल नहीं है। अधपके से गिलगिले से लगने वाले मोमोज के एक रिक्शा वाले से लेकर कॉलेज गोइंग लड़के-लड़कियां तक इनके दीवाने हैं, जो छोटे ठियों और दुकानों पर अक्सर इनका मजा लेते दिखते हैं।

तिब्बती और नेपाली रेस्तराओं में मोमोज की कई वैरायटी मिलती हैं। हालांकि दिल्ली के छोटे ठीयों पर मोमोज की दो-तीन वैरायटी ही मिलती हैं। दिल्ली में अमूमन आपको नॉनवेज और वेज मोमोज मिलेंगे, जो फ्राइड या फिर बेक किए हुए होते हैं। इसके अलावा सी-मोमो, कोथे मोमो, मोमो सूप और फ्राइड मोमो सभी जगह पसंद किए जाते हैं। सी-मोमो को हॉट एंड स्पाइसी सॉस के साथ परोसा जाता है तथा इसे बनाने में प्याज और कैप्सिकम डाली जाती है। आमतौर पर इसे बाउल में सर्व किया जाता है। फ्राइड मोमोज डीप फ्राई किया जाता है। मोमो सूप खाने वाले की पसंद पर निर्भर करता है, जिसे मोमोज के साथ सर्व किया जाता है। कोथे मोमो को पैन में फ्राई किया जाता है, जिससे इसका टेस्ट बदल जाता है।

मोज के शंकर एक इनपुट एड करते हुए कहते हैं, ‘मोमोज का टेस्ट लोगों को बहुत पसंद आ रहा है। यह लोगों के लिए नई चीज है। खासतौर से शाम के समय जो लोग पहले घर से बाहर निकल चाट-पकौड़ी या फिर समोसे खाना पसंद करते थे, अब उन्हें मोमोज पसंद आ रहे हैं। एक तो यह काफी सस्ते होते हैं। मोमोज की एक प्लेट 15 से 30 रुपये में मिल जाती है, जिसमें तकरीबन 10 वेज पीस को दो लोग आराम से खा सकते हैं। इसकी चटनी उन्हें काफी पसंद आती है। दूसरा इसमें चाउमिन जैसा कोई झंझट नहीं है।’ लगभग सभी मोमोज वाले इन्हें विभिन्न बेकरी या फिर एजेंट से खरीदते हैं यानी इन्हें बनाना सीखना भी जरूरी नहीं है। अब तो इसकी चटनी भी रेडीमेड मिलने लगी है। बड़े होटलों, रेस्तरां से होते हुए चाईनीज फूड वैन ने भी मोमोज के क्रेज को दोगुना करने में एक अहम भूमिका निभाई है। मंडी हाउस के पास बंगाली मार्केट रोड पर एक अरसे से चाईनीज फूड परोस रही एक वैन के मोमोज भी काफी फेमस हैं। लोग यहां के चिकन मोमोज खासे पसंद करते हैं। यहां के एक दुकानदार ने बताया, ‘मोमोज की ही तरह अब धीरे-धीरे डिमसम भी अपनी पैठ बढ़ा रहा है। हालांकि डिमसम ठियों तक नहीं पहुंचा है, लेकिन विभिन्न छोटे-बड़े रेस्तरां के अलावा अब यह स्थानीय बाजारों में बिकता दिखाई दे रहा है।’ डिमसम दिखने में मोमोज की तरह ही है। टेस्ट में भी कोई बड़ा फर्क नहीं है। हां, इसकी कीमत बेशक मोमोज से ज्यादा है। विभिन्न स्थानों पर डिमसम की एक प्लेट 50-60 रु. से शुरू होती है, जो अच्छे रेस्तरां में 120 रुपये तक है। बड़े रेस्तरां और होटलों में मोमोज को एपिटाइजर के रूप में परोसा जाता है।

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