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धैर्य की परीक्षा

काम पर जाने की जल्दी में भी सब कुछ समेटने के बाद जब लाल बत्ती सामने दिखती है तो समय पर पहुंचने की बेचैनी में वह खाली बैठकर इंतजार करना बहुत बड़े धैर्य को दिखलाता है। किन्तु जो व्यक्ति उस समय अपने पर काबू न रखकर आगे निकल जाता है वह खुद ही गलत नहीं करता, दूसरों को भी उसके लिए प्रेरित करता है। जब वह पकड़ा नहीं जाता तो दूसरे भी पहले सरकते हैं फिर स्पीड बढ़ाकर निकल जाते हैं।

पुलिस का किया गया चालान इस अधीरता की सबसे कम सजा है। हादसे ऐसी ही बेचैनी का परिणाम होते हैं। टक्कर लगने या किसी को चपेट में ले लेने से काम की जगह थाने जाना पड़ सकता है। एकल परिवार हो या संयुक्त, धैर्य की आजमाइश बराबर चलती रहती है। हम एक दिन पहले से सुबह की तैयारी कर लेते हैं, पर सुबह बच्चा रोता हुआ उठता है, उसे पेट दर्द है या बुखार, सारी तैयारी धरी रह जाती है। सब ठीक है पर ड्राइवर नहीं आया, हमारा जल्दी उठ कर तैयार होना बेकार हो जाता है।

यह रोजमर्रा की चीजें हमें आध्यात्मिकता की सबसे कठिन शिक्षा धैर्य की सीख देती हैं। हम अपनी परिस्थितियों को झेलना, कठिन समय में धैर्य बनाए रखना सीख कर ही समय काट सकते हैं। दुखी बच्चे को संभालना तो ठीक है पर ड्राइवर की नाइंसाफी भी चुपचाप सहनी पड़ती है अन्यथा काम वालों से गुजारा ही नहीं चल पाता। एक बददिमाग अधिकारी हो या स्वार्थी सहयोगी, गुस्सैल पति हो या चिड़चिड़ा बच्चा, हर समय सबके साथ संतुलन बनाए रखने में एक ही चीज काम आती है- धैर्य।

सुबह उठने से रात को सोने तक इसी परीक्षा से गुजरते हैं। यह हमारी कमजोरी नहीं ताकत है। इसकी बदौलत मन शांत रहता है, परेशानियों से निबटा जा सकता है। भले ही बहुत कठिन है पर इस परीक्षा से निकलकर ही सफलता मिलती है।

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