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अज्ञान की विचारधारा

सुपरिचित चित्रकार-लेखक अशोक भौमिक की रंगकर्मी बादल सरकार पर लिखी हुई और बहुत अच्छी किताब अंतिका प्रकाशन से आई है। इस किताब में एक बात खटकी। ‘स्पाटकिस्ट’ के लेखक हॉवर्ड फास्ट पर एक परिचयात्मक टिप्पणी दो चार वाक्यों के अंत में है। उसका अंतिम वाक्य कुछ यों है कि हावर्ड फास्ट आजीवन मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े रहे। हावर्ड फास्ट का जन्म 1914 में हुआ और उनकी मृत्यु 2003 में हुई। रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस के बाद कम्युनिस्ट पार्टी और विचारधारा से उनका मोहभंग हो गया था यानी जीवन के अंतिम लगभग 47 साल वे मार्क्सवाद विरोधी रहे।

भौमिक जी ने तो सिर्फ एक टिप्पणी में हावर्ड फास्ट का जिक्र किया है, वह बड़ा मुद्दा नहीं है। एकाध साल पहले ‘समकालीन जनमत’ में ‘हावर्ड फास्ट का साहित्य चिंतन’ या ऐसे ही किसी विषय पर एक ठीकठाक लंबाई का लेख छपा है, उसमें भी इस बात का जिक्र नहीं है कि हावर्ड फास्ट कम्युनिस्ट विरोधी हो गए थे। अब इन लोगों को क्या दोष दें, मुझे भी लंबे वक्त तक हावर्ड फास्ट के राजनैतिक विचारों में परिवर्तन के बारे में मालूम नहीं था। जब हम वामपंथ के सहयात्री थे, तो किसी ने बताया नहीं, बाद में जानने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। बहुत सारे वामपंथी मित्रों को भी यह नहीं मालूम होगा।

समस्या यह है कि विचारधाराएं चाहे वे वामपंथी हों या दक्षिणपंथी मूलत: अज्ञान और साथ ही साथ ज्ञान के दंभ के साथ ही चलती हैं। कुछ ऊंचे लोग होते हैं, उन्हें ज्यादा जानकारी होती है लेकिन वे कूट छान कर तय करते हैं कि ज्यादातर अनुयायियों के लिए क्या-क्या और कितनी मात्रा में पढ़ लेना उपयुक्त होगा, किन-किन मामलों में जानकारी नहीं, सिर्फ बने बनाए मत काफी होंगे। दक्षिणपंथी मित्रों के अपने अज्ञान के अंधेरे हैं, वामपंथियों के अपने। इसी अज्ञान के सहारे भाई लोग दुनिया बदलने की सोचते हैं।

विचारधाराओं के साथ दिक्कत यह है कि वे मनुष्य के महज जिज्ञासा वाले स्वभाव को नष्ट करती है, वे कुछ खोजने का आनंद नष्ट कर देती हैं क्योंकि उनके पास तयशुदा जवाब होते हैं। आप मान लेते हैं कि माक्सिम गोर्की के आप विशेषज्ञ हो गए और आपको नहीं पता होता कि रूसी क्रांति के बाद गोर्की के नेताओं से कितने तीखे मतभेद हुए कि उन्हें ससम्मान देश से बाहर करवा दिया गया। वैसे ही जैसा कोई संघ परिवार से जुड़ा व्यक्ति नहीं जान पाता कि उसके परमपूज्य नेताओं की आजादी के आंदोलन में कोई भूमिका नहीं थी। सब कुछ कोई भी नहीं जान पाता, लेकिन जानने की उत्सुकता का तो कुछ महत्व होता है या नहीं?

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