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फॉस्फोरस

फॉस्फोरस बेहद संवेदनशील पदार्थ होता है। यह तेजी से ज्वलनशील पदार्थो के साथ क्रिया करता है। इसी से ‘फॉस्फोरेसेंस’ का नाम भी रखा गया है जिसका मतलब होता ही है ज्वलनशील क्षमता वाला पदार्थ। मूलत: फॉस्फोरस सफेद और लाल अवस्थाओं में पाया जाता है। लेकिन यह खुली अवस्था में नहीं पाया जाता। आवर्त सारिणी में इसे अंग्रेजी शब्द ‘पी’ से इंगित किया जाता है और इसका अणु क्रमांक 15 है।

पहली बार यह सफेद अवस्था में 1669 में हेनिग ब्रांड ने खोजा था, तभी इसका नाम यूनानी मिथकों के आधार पर खा गया था। इसे शुक्र ग्रह यानी वीनस से संबद्ध माना गया है। फॉस्फोरस डीएनए, आरएनए, एटीपी का अंश होता है। इस कारण यह सभी जीवित प्राणियों की कोशिकाओं का आवश्यक अंग होता है। इसके अतिरिक्त विस्फोटक सामग्री, माचिस, पटाखों, कीटनाशक, टुथपेस्ट और डिटरजेंट में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।

जो प्रक्रिया फॉस्फोरस को उसकी ज्वलनशील क्षमता प्रदान करती है उसे ‘कैमिल्युमिनसेंस’ कहते हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि ऑक्सीजन से क्रिया करने पर फॉस्फोरस आग पकड़ता है, लेकिन ऐसा नहीं है। कुछ विशेष किस्म के दबावों के कारण यह क्रिया होती है। इस कारण फॉस्फोरस में चमक पैदा होती है। इसका कारण 1974 में आर. जे. वान जी और ए. यू. खान ने बताया था। इसके अनुसार फॉस्फोरस की सतह पर ऑक्सीजन क्रिया करती है जिस कारण एचपीओ और पी2ओ2 जैसे अणु कुछ देर के लिए अस्तित्व में आते हैं। लिहाजा, क्रिया धीमी होती है और इससे पैदा होने वाली चमक के लिए अन्य कम ही सहायकों की जरूरत पड़ती है।

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