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चालीस साल बाद कैसी होगी काशी

संकरी सड़कें, वाहनों का बढ़ता लोड, ध्वस्त ट्रैफिक व्यवस्था, जनसंख्या वृद्धि, पूर्वाचल का व्यवसायिक सेंटर होने के कारण बढ़ते ‘माइग्रेशन’ के कारण 40 साल बाद बनारस की स्थिति विस्फोटक हो सकती है। कारण भी साफ है। अब तक की आबादी के लिहाज से तैयार इंफ्रास्ट्रक्चर को देखा जाए तो आने वाले दिनों में बदलाव की बहुत कुछ गुंजाइश नहीं दिखती है। जो परियोजनाएं चल रहीं हैं वह पूरी भी होंगी या नहीं? अनिश्चितता बरकरार है। गंगा सिमट रही हैं। महायोजना के तहत तैयार परियोजनाओं में कई की शुरुआत तक नहीं हो सकी। रिंग रोड हो या सड़कों की चौड़ाई।

सब जस का तस है। बीते तीन दशकों पर नजर डालें तो पता चलता है कि बाजार, गलियां, सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएं सब कुछ पुराने र्ढे पर हैं। चौतरफा विस्तार की जगह शहर ऊंचाई में बढ़ता गया। यानि, पुरानी सीवर लाइनों पर इमारतों की नींव खड़ी होती गई। कहीं कोई बदलाव नहीं हुआ। मॉल, मल्टी स्टोरी बिल्डिंग विदेशी कंपनियों के आफिस, हास्पिटल, शिक्षा केन्द्र भले ही हो गए हों, लेकिन बनारस का विस्तार जितना होना चाहिए था नहीं हुआ। शहर एक निश्चित दायरे में सिमटकर रह गया। जो परियोजनाएं दो दशक के अंदर बनी वह पूरी ही नहीं हुई। जनसंख्या वृद्धि को देखते हुए मूलभूत सुविधाओं सीवर, पेयजल, बिजली, पर्यटन एवं स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोत्तरी एवं उसके मार्डनाइजेशन की प्रक्रिया को तत्काल नहीं अपनाया गया तो ‘काशी कबहू न छोड़िए विश्वनाथ दरबार’ कहने वाले यहीं कहेंगे अब बनारस छोड़ने में ही भलाई है।

नए सिरे से बनाना होगा इंफ्रास्ट्रक्चर
जनसंख्या विस्फोट के कारण बनारस की स्थिति हर दिन बदल रही है। ऐसे में नए सिरे से यदि इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं किया गया तो आने वाले कल की तस्वीर भयावह होगी। हालांकि हालात मे इस तस्वीर में बहुत बदलाव होता नहीं दिखाई देता।1991 की जनगणना के अनुसार जिले की आबादी 31,38,671 थी। वर्तमान में यह 40 लाख के पार है। हर वर्ष 2.5 प्रतिशत की दर से आबादी बढ़ रही है। जिला अर्थ संख्या अधिकारी संतोष सिंह के मुताबिक तेजी से माइग्रेट होकर आने वालो के कारण अगले 40 साल के बाद दो गुना से अधिक होगी। मतलब 80 लाख से एक करोड़ के बीच। ऐसे में शहर के विस्तारीकरण के लिए नई काशी, ट्रांसपोर्ट नगर सहित अन्य परियोजनाओं को मूर्तरूप देना होगा।


पानी के लिए होगी मारामारी
यूं ही बना रहा आबादी का दबाव तो पानी के लिए सबसे अधिक मारामारी होगी। गंगा तेजी से सिमट रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक शहर की एक तिहाई आबादी की प्यास गंगा से ही बुझती है। साथ ही 124 बड़े एवं 49 छोटे नलकूप भी लगे हैं। फिर भी शहर में पानी के लिए हाय-तौबा मची रहती है। गंगा का जलस्तर सिमटता जा रहा है। जलश्रोत भी तेजी से खिसक रहे हैं। ऐसे में यदि गंगा सूख गई तो? पानी कहां से आएगा? जेएनएनयूआरएम के तहत जिस प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है वह 18 लाख की आबादी के लिहाज से महायोजना 2011 के अनुपात पर तैयार है। इसी आधार पर डिमांड एवं आपूर्ति की जा रही है। अभी भी लीकेज से 30 प्रतिशत पानी बर्बाद होता है। 67 एमएलडी पानी की कमी हमेशा रहती है। बकौल एक अधिकारी, अभी नहीं चेते तो आने वाले दिनों में पानी के लिए सड़कों पर खून बहेगा।

ध्वस्त हो जाएगी ट्रैफिक व्यवस्था
ट्रैफिक की स्थिति विकराल होगी। तीन दशक से सड़कें जस की तस है। तब से लेकर अब तक लाखों वाहन सड़कों पर फर्राटे भर रहे हैं। ट्रैफिक व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है, सुधार की गुंजाइश नहीं दिखती है। कारण साफ है तमाम कोशिशों के बावजूद सड़क चौड़ी नहीं हो सकी। बंदोबस्ती नक्शा में प्रमुख सड़कों की चौड़ाई 80 फुट है। जबकि वर्तमान में यह कहीं 40 तो कहीं 50 फुट है। अतिक्रमण का संजाल अलग है। परिवहन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक प्रतिमाह दो से ढाई हजार गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन होता है। इनमें बड़े एवं चार पहिया वाहनों की संख्या सिर्ख 10  प्रतिशत है। 90 प्रतिशत दो पहिया वाहन होते हैं। यानि, 25 हजार वाहन प्रति वर्ष सड़क पर उतर रहे हैं। अब तक के आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या साढ़े तीन लाख के करीब है। अनुमानत: चार दशक बाद सड़क पर 15 लाख वाहनों की कतार के बीच से लोगों को गुजरना होगा। हो सकता है वाहन के बदले शहरी क्षेत्र में लोगों को पैदल चलना पड़े।

कभी-कभी होंगे बिजली के दर्शन
बिजली आपूर्ति की स्थिति और खराब होगी। उत्पादन में लगातार गिरावट की स्थिति बनी हुई है। अभी शहरी एरिया में डिमांड 320 एमबीए की है। आपूर्ति 280 एमबीए हो रही है। यानि 40 एमबीए की कमी। विभागीय दावा 18 घंटे विद्युत आपूर्ति का है। लेकिन, कोई ऐसा इलाका नहीं जहां पर 8 से 10 घंटे प्रतिदिन बिजली कटौती न होती हो। ट्रांसमिशन सेक्शन के अधीक्षण अभियंता एके चतुर्वेदी के मुताबिक डिमांड आबादी को देखते हुए किया गया है। सब स्टेशन सहित अन्य कई परियोजनाएं एक दशक से लम्बित हैं। चार दशक बाद आबादी के हिसाब वर्तमान डिमांड को देखते हुए तीन गुना बिजली की खपत ज्यादा होगी।

सेहत से खिलवाड़ करेंगे नीम-हकीम
जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति तो और भी खराब होगी। वर्तमान में बीएचयू, कबीरचौरा, दीनदयाल तीन बड़े अस्पताल हैं। इसके अलावा 174 पंजीकृत प्राइवेट नर्सिग होम, छह-छह सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, 22 अतिरिक्त स्वास्थ्य केन्द्र एवं 306 उपकेन्द्र है। फिर भी अस्पतालों में सुबह से शाम तक भीड़ रहती है। बेड न होने से मरीजों को जमीन पर सोना पड़ता है। यह हाल तब है कि जिले की अनुमानित आबादी 40 लाख है। सीएमओ के मुताबिक तेजी से बढ़ती आबादी को देखते हुए हास्पिटल की संख्या में वृद्धि करनी होगी। वरना, सेहत से नीम-हकीम खिलवाड़ करेंगे।
आंकड़े एक नजर में-
1901 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या- 3138671
अनुमानित जनसंख्या- 40 लाख के पार
जनसंख्या में ग्रोथ प्रतिवर्ष 2.5 प्रतिशत
40 साल बाद अनुमानित जनसंख्या- 80 लाख से एक करोड़ के बीच
पानी-
डिमांड- 276 एमएलडी
आपूर्ति- 209 एमएलडी
लीकेज- 89 एमएलडी
कमी- 67 एमएलडी
प्रतिदिन पेयजल की उपलब्धता- 130 एपीसीडी
संभावनाए- एक हजार एमएलडी
वाहन    
प्रतिमाह- 2500  
वर्तमान वाहनों की संख्या- 350000                  
40 साल बाद अनुमानित: 15 लाख
बिजली-   
डिमांड- 300 एमबीए
आपूर्ति- 280 एमबीए
40 साल बाद अनुमानित: तीन गुना यानि 900 एमबीए
वर्तमान परियोजनाएं: भेलूपुर, गजोखर, हुकुलगंज, कैथी सहित अन्य स्थान पर सबस्टेशन लगेंगे।
नोट: सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सात प्रतिशत ग्रोथ हर साल हो रहा है।
स्वास्थ्य सुविधाएं-
तीन बड़े अस्पताल- बीएचयू, कबीरचौरा व दीनदयाल
पंजीकृत नर्सिग होम-174
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र- 6
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र-6
अतिरिक्त स्वास्थ्य केन्द्र-22
प्राथमिक उपकेन्द्र -306
प्रति वर्ष आने वाले पर्यटकों की संख्या-(अक्टूबर 09 तक)
देशी- 2968044
विदेशी- 140451
क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी दिनेश कुमार के मुताबिक काशी में पर्यटन की अपार संभावनाएं है। एक दशक बाद पर्यटकों की संख्या में दो गुना वृद्धि होती है। वित्तीय वर्ष में आंकड़ा 50 लाख पार होने की संभावना है। चार दशक बाद आंकड़ा एक करोड़  से अधिक होगा।

अधूरी परियोजनाएं -
नई काशी, ट्रांसपोर्ट नगर, कामधेनु नगर, बलुआघाट व रामनगर पर पुल का निर्माण।

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