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आस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम निर्यात होने का संकेत

आस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम निर्यात होने का संकेत

विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय पैनल की रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि आस्ट्रेलिया भारत को अपना यूरेनियम निर्यात कर सकता है। पहले परमाणु परीक्षण के बाद से ही न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप ने भारत के साथ किसी भी तरह के परमाणु व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया था। 1974 में कनाडा ने भारत के साथ किसी भी तरह के न्यूक्लियर व्यापार पर रोक लगा दी थी। 2008 में न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप द्वारा भारत पर से प्रतिबंध हटाने के बाद कनाडा को भी इस ओर सोचना पड़ा था। 2008 में भारत और अमेरिका के बीच हुए परमाणु संधि के बाद कई देशों ने भारत के साथ असैन्य परमाणु व्यापार को मंजूरी दे दी।

कुछ समाचार पत्रों में बुधवार को प्रकाशित खबरों में कहा गया है कि आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री केविन रड और उनके जापानी समकक्ष द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय पैनल की रिपोर्ट में परमाणु अप्रसार संधि में बदलाव की सिफारिश की गई है। इसके बाद संभावना है कि आस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम बेचने पर लगा प्रतिबंध हटा सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एनपीटी संधि में तीन देश शामिल नहीं हैं। ये देश भारत, पाकिस्तान और इस्राइल हैं। इन देशों को समानांतर उपायों पर हस्ताक्षर करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ये देश असैन्य परमाणु सामग्री का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए नहीं करेंगे। ऐसा करने पर इन देशों को यूरेनियम तथा अन्य परमाणु सामग्री और प्रौद्योगिकी मिलने की राह प्रशस्त हो जाएगा।

जापान के प्रधानमंत्री युकियो हातोयामा ने मंगलवार को कमीशन ऑन न्यूक्लियर नॉन प्रोलिफरेशन एंड डिस्आर्मामेंट रिपोर्ट जारी की जिसमें की गई सिफारिशें भारत को यूरेनियम के निर्यात के लिए गतिरोध दूर कर सकती हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि सचाई यह है कि भारत, पाकिस्तान और इस्राइल संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे और इसका मतलब है इस बात के सभी प्रयास किए जाने चाहिए कि व्यवस्था में उनकी समान भागीदारी होनी चाहिए जो अप्रसार तथा निरस्त्रीकरण के दायित्वों के समतुल्य हो।

रिपोर्ट में कहा गया है कि असैन्य उद्दश्यों के लिए परमाणु सामग्री और प्रौद्योगिकी तक इन देशों की पहुंच एनपीटी सदस्य के रूप में होनी चाहिए। रड और उनके तत्कालीन जापानी समकक्ष ने 18 महीने पहले इन चिंताओं के बीच एक आयोग स्थापित किया था कि संधि निर्थक साबित हो रही है, क्योंकि उत्तर कोरिया और ईरान परमाणु कार्यक्रम चला रहे हैं।

इसमें आहवान किया गया है कि पहले इस्तेमाल न करने के संकल्प के साथ परमाणु शक्तियों को अपने 23 हजार परमाणु अस्त्रों की संख्या को घटाकर 2025 तक 2000 के आंकड़े तक ले आना चाहिए।

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