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गरीबी की रेखा और राजनीति

मुल्क में कितने लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं? क्या हिन्दी पट्टी के राज्यों में सबसे अधिक गरीब लोग बसते हैं? गरीबी हटाने के तमाम उपायों के बावजूद ताजा आंकलन में देश में गरीबों की तादाद 28 प्रतिशत से बढ़ कर 37 प्रतिशत हो गई है। गरीबी को लेकर देश में हुए सभी सर्वेक्षणों में एक साम्यता है कि बिहार में सर्वाधिक गरीबी है। लंबे समय से गरीबी रेखा से लोगों को ऊपर उठाने के सरकारी दावे के बावजूद सर्वाधिक गरीब बिहार और उत्तर प्रदेश समेत हिंदी पट्टी में ही बसते हैं।

बिहार और यूपी में इन दिनों गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को लेकर राजनीति गरमा गई है। बिहार में गरीबी और विसंगतियां कुछ ज्यादा ही हैं। माना जाता है कि देश में 1.9 प्रतिशत परिवार भूख से पीड़ित हैं। यह स्थिति पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम और बिहार जैसे कुछ राज्यों में ज्यादा है। भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में अपर्याप्त भोजन (वर्ष 2004-05) वाले परिवारों की संख्या 2.7 प्रतिशत है और निर्धन जनसंख्या का प्रतिशत 41.4 है। राज्य में तीन वर्ष की उम्र के कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 58.4 है। राज्य की 67 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।

गरीबी और गरीबों का सवाल बिहार के लिए नया नहीं है। नया यह है कि अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि बिहार में गरीबी रेखा से नीचे रहने ?वाले लोगों की तादाद 54.4 प्रतिशत तथा उड़ीसा में 57.2 प्रतिशत, झारखंड में 45.3 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 48.6 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 49.4 प्रतिशत तथा उत्तर प्रदेश में 40.9 प्रतिशत है। मुल्क का हर तीसरा आदमी गरीब है। समिति की रिपोर्ट आने के बाद गरीबी रेखा का मसला सतह पर आ गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से कहते रहे हैं कि बिहार में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या भ्रामक है। मनमाने ढंग से गरीबों के आंकड़ों क ो कम किया जाता रहा है।

योजना आयोग से गठित तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट आने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केंद्र पर लगातार निशाना साध रहे हैं। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी के आंकड़ों को लेकर यह हथियार की तरह इस्तेमाल हो रहा है। मुख्यमंत्री की बातों की पुष्टि तेंदुलकर समिति ने कर दी है। मुख्यमंत्री का कहना है कि केंद्र सरकार यह तय करती है कि कितने लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, तो उसे ही तय करना चाहिए कि गरीब कौन है। उनकी पहचान केंद्र ही करे। वे गरीबी मापने के पैमाने को गलत ठहराते हैं और मांग करते हैं कि केंद्र सरकार गरीबों की गणना के लिए एक आयोग गठित करे।

बिहार में गरीबी रेखा से नीचे कितने लोग और परिवार रहते हैं इसको लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। पहले यह माना जाता था कि बिहार में 42 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करते हैं।  बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों की तादाद नेशनल सैम्पल सर्वे संगठन (एनएसएसओ ) के अनुसार 1983-84 में 64 प्रतिशत थी और 2004-05 में घट कर 45 प्रतिशत हो गयी। अब 54.4 प्रतिशत है, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एन.सी. सक्सेना के अध्ययन के हवाले से यह कहते हैं कि बिहार में गरीबी रेखा से नीचे लगभग 75 प्रतिशत लोग हैं।

उधर अजरुन सेन गुप्ता समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि देश में 77 प्रतिशत लोगों की हालत अत्यंत दयनीय है और सिर्फ 23 प्रतिशत लोग ही सुखी हैं। जब देश के 77 प्रतिशत की हालत को अत्यंत खराब कहा जाएगा तो उस आधार पर बिहार में दयनीय हालत वाले लोगों की संख्या 80 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी। प्रकारांतर से देखें तो तमाम समितियों की रिपोर्ट सरकार के एनएसएसओ की रिपोर्ट को खारिज करती हैं। इसका अर्थ यह भी है कि लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने वाली कल्याणकारी योजनाएं कारगर नहीं हो पा रही हैं।

केंद्र से बिहार सरकार को गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 65 लाख परिवारों के लिए और  उत्तर प्रदेश को 1 करोड़ 67 लाख परिवारों के लिए अनाज मिलता है।  बिहार सरकार ने इस मसले पर सर्वेक्षण करा कर पाया कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले की संख्या एक करोड़ 22 लाख है। राज्य सरकार के सर्वेक्षण के बाद भी बड़ी संख्या में शिकायतें मिलनी शुरू हो गईं कि बड़ी संख्या में लोगों के नाम छूट गए हैं। नाम छूटने की शिकायतें लगभग 60 लाख आईं। उसकी भी जांच-पड़ताल हो रही है और माना जाएगा कि राज्य सरकार की सूची में 20 लाख नाम और जुड़ जाएंगे। इसका अर्थ यह कि बिहार में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों  की तादाद लगभग डेढ़ करोड़ पहुंच जाएगी। इसी तरह उत्तर प्रदेश में एक करोड़ 67 लाख की अपेक्षा दो करोड़ चालीस लाख परिवार बीपीएल की जद में हैं।
 
वास्तव में बिहार या अन्य राज्यों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का सवाल गरीब राज्य के अर्थशास्त्र के साथ सीधे जुड़ा हुआ है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को कम कर आंका जाएगा तो केंद्र से मिलने वाले कोटे का अनाज कम हो जाएगा। फिलहाल केंद्र से बिहार को राशन और किरोसिन का कोटा 65 लाख परिवारों के लिए मिलता है। ऐसे में राशन-किरोसिन पर मार तो पड़ती ही है विभिन्न योजनाओं के लिए केंद्र से मिलने वाली राशि पर भी मार पड़ती है। आकलन सही नहीं होने अथवा आकलन कम होने की स्थिति में गरीब राज्य नुकसान झेलते हैं।

स्वाभाविक तौर गरीबों का आकलन अधिक होगा तो सहायता राशि भी अधिक होगी। ऐसे में यह सब अकारण नहीं हो रहा है। यह बाद की बात है कि गरीबों की चिंता कौन और कितना करता है। बिहार के जाने-माने अर्थशास्त्री शैवाल गुप्ता का मानना है कि सरकार के गरीबी आकलन का तरीका साठ के दशक का बना हुआ है। उस जमाने में यह मान कर चला जाता था कि शिक्षा और स्वास्थ्य सरकार के जिम्मे होगा, लेकिन इस मामले से केंद्र सरकार पूरी तरह भाग खड़ी हुई है। ऐसे में सरकार के गरीबी मापने के तरीके को बदला ही जाना चाहिए। अन्यथा, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्यों के साथ कभी खुले तौर पर और कभी छुपे तौर पर भेद-भाव होता रहेगा।

लेखक हिंदुस्तान, पटना में विशेष संवाददाता हैं

srikant@hindustantimes.com

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