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ब्लॉग वार्ता : कोपेनहेगन या कोपभाजन

किसी भी घर में मां सबसे उपेक्षित होती है। प्यार तो करते हैं मगर मां का ख्याल नहीं करते। सारी श्रद्धा पिताओं पर ही उमड़ती है। धरती भी मां है। वो भी धरा के घरों की मां की तरह उपेक्षित है। आखिर हमने कब रसोई में जाकर कहा कि मां अब छोड़ दो, बाकी का काम हम कर देते हैं। वही हाल धरती के साथ हो रहा है। कोई धरती के लिए घर से निकलने को तैयार नहीं। डेनमार्क की राजधानी में धरती बचाने के नाम पर इतिहास में अपना नाम सही से शामिल हो, इसी की चिंता ज्यादा है। हिंदी के ब्लॉगर बंधु कोपेनहेगन पर खूब लिख रहे हैं। कोप से निकलेगा होप। कोप का मतलब श्राप भी होता है। ब्लॉगर कोपेनहेगन का विच्छेद कर उसका निराशाकरण कर रहे हैं।

http:/www.visfot.com लिख रहा है जैसे-जैसे कोपेनहेगन सम्मेलन आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे आशा-उम्मीदों के कोपेनहेगन सम्मेलन के बीच की कई अंदरूनी जानकारियां बाहर आ रही हैं। ऐसा लगता है कि कोप-15 सचमुच विकासशील देशों पर कोप का अखाड़ा बनता जा रहा है और विकासित देश अपने विनाशकारी उपभोग की जीवनशैली को हर कीमत पर सुरक्षित रखते हुए विकासशील और गरीब देशों को हर कीमत चुकाने के लिए तैयार करना चाहते हैं। मीनाक्षी अरोड़ा के इस लेख को ब्लॉगरों ने काफी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है। लेखिका कहती हैं कि उपभोगवादी जीवनशैली, अंधाधुंध औद्योगीकरण, खेती का नाश, जल-जंगल-जमीन पर पूंजीपतियों का कब्ज़ा, नदियों, तालाबों और समुद्र को ज़हरीला होने से नहीं रोका गया तो कोपेनहेगन जैसे सम्मेलन भी बेनतीजा रहेंगे।

http:/hindi.indiawaterportal.org पर जायेंगे तो पर्यावरण की तमाम जानकारियां आपको हिंदी में मिलेंगी। दिल्ली के लिए योजना बनी है कि हिमाचल से पानी उतार कर इसकी प्यास बुङो। यह लेख बताता है कि इस बांध से अनेक परिवारों का घर उजड़ेगा। परिवारों को केवल मुआवज़ा भर देने की योजना है। अब यहीं पर सवाल उठता है कि जिस दिल्ली के लोगों को इस बात की फिक्र नहीं कि उनकी वजह से हिमाचल का पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है, उस दिल्ली के लोगों और नीतिकारों पर कैसे भरोसा करें कि वे पर्यावरण को लेकर निरपेक्ष तरीके से गंभीर हैं। स्कूलों में पर्यावरण के नाम पर चित्रकारी प्रतियोगिता करा देने से संवेदनशीलता नहीं आती। हम अमेरिका की दादागिरी तो देख लेते हैं, लेकिन अपने देश के भीतर सरकारों और महानगरों की दादागीरी को नहीं देखते।

मशहूर कवि दिलीप चित्रे की इस कविता को कोपेनहेगन के संदर्भ में पढ़ने में कोई बुराई नहीं। एक अच्छे कवि का दुनिया से चले जाना और हमारे लिए इन पंक्तियों को छोड़ जाना, एक कोशिश ही होगी कि हम सब धरती का ख्याल रखें। धरती तेजी से अपनी स्मृति खोती जा रही है और इसमें मैं अपनी स्मृतियों को खोता हुआ पाता हूं। अब मैं पाता हूं कि यह धरती छोटी पड़ गई है, अपनी असंख्य और अकबकाई मनुष्यता के लिए, जहां हर कोई एक दूसरे की जगह हड़प लेना चाहता है, और जगह बचती नहीं है किसी की स्मृतियों के लिए, खुद स्मृति की भी नहीं।

http:/nukkadh.blogspot.com पर क्लिक करते ही नुक्कड़ के उम्मेद सिंह पर्यावरण को लेकर उत्तेजित मिलते हैं। कहते हैं कि विकसित देशों के जीने का ढंग ही धरती विरोधी है। वे कहते हैं कि अस्तित्व परस्पर विरोधी है। उम्मेद की दलील है कि अस्तित्व स्वयं ही सह-अस्तित्व है। लेकिन पश्चिम को धुन देने से ही काम नहीं चलेगा। हमें स्वीकार करना चाहिए कि भारतीय भी कम उपभोक्तावादी नहीं हैं। भकोसने में हम किससे कम हैं। नदियों को पूज पूज कर मैला कर दिया।

http:/antarsohil.blogspot.com यह पता है अन्तर-सोहिल ब्लॉग का। इस पर बताया जा रहा है कि अध्यात्म के रास्ते पर्यावरण के लिए क्या कर सकते हैं। इनका टेंशन ये है कि अगर धरती के सभी 20 करोड़ घरों में प्रतिदिन यज्ञ होने लगे तो प्रदूषण दूर हो जाएगा। वाहनों, मिलों, कारखानों द्वारा उत्पन्न प्रदूषित वायु को यज्ञ के द्वारा उत्पन्न शक्तिशाली धूम की एक मात्र ही शुद्द करने में सक्षम है।

अध्यात्म के जरिये अगर पर्यावरण के मुद्दे पर लोग संवेदनशील हो सकें तो इसका भी इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन इस तरह के तात्कालिक और गारंटी वाले उपायों से मुङो समस्या है। ये उसी तरह है जैसे मलेरिया डिपार्टमेंट। धुएं से मच्छर भगाकर खुश हो लेता है कि धरती से मच्छर गायब। अध्यात्म मार्ग को भी समझना होगा कि कारखानों को सीमित करना होगा तभी हम प्रदूषण कम कर सकेंगे। कहां कहां आप अगरबत्ती जलायेंगे और यज्ञ करेंगे। हर चौराहे पर किसी पुरोहित को बिठाना होगा। आप यज्ञ करते रहिए और हमारी मोटरसाइकिल धुआं छोड़ती रहेगी।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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