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महंगाई से मुश्किलें

नवम्बर में मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 4.78 प्रतिशत हो गई है और इसने सरकार के सामने कई जटिल सवाल खड़े कर दिए हैं। अपने आप में यह मुद्रास्फीति दर कोई खतरनाक नहीं है लेकिन जिन परिस्थितियों में दर यहां तक पहुंची है उससे चेतावनी की घंटियां बजती हैं। पिछले दिनों आर्थिक मंदी के चलते मुद्रास्फीति की दर बहुत कम थी लेकिन जो कुछ भी थी वह भी बेहद जरूरी खाने-पीने की चीजों की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी की वजह से थी। खाद्य पदार्थो की महंगाई की दर लगभग बीस प्रतिशत पहुंच रही है और मुद्रास्फीति की दर भी मुख्यत: इसी वजह से बढ़ी है।

दिक्कत यह है कि सरकार के पास फौरी तौर पर कोई उपाय नहीं है कि खाद्य पदार्थो की महंगाई कम कर सके। रिजर्व बैंक पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बन रहा है लेकिन खतरा यह है कि इससे अर्थव्यवस्था के सुधार पर बुरा असर हो सकता है। दूसरे, यह तर्क भी लगातार दिया जा रहा है कि खाद्य पदार्थो की कमी से होने वाली महंगाई पर मौद्रिक उपाय कितने कारगर होंगे। हमारी अर्थव्यवस्था चलाने का अंदाज अब भी काफी पुराने ढंग का है इसलिए रिजर्व बैंक नकदी घटाने के कुछ उपाय जरूर करेगा लेकिन सवाल यही है कि कब? सरकार खाद्य पदार्थो की उपलब्धि बढ़ाने की कुछ कोशिशें जरूर कर सकती है लेकिन यह महंगाई सचमुच अगर थम सकती है तो रबी की फसल आने पर ही।

दरअसल पिछले वर्ष से हम खाद्य पदार्थो की कमी से जो महंगाई झेल रहे हैं, वह कई वर्षो की गड़बड़ियों का मिला-जुला फल है। एक ओर सेवा और उद्योग क्षेत्र के विकास से विकास दर तो बढ़ गई लेकिन खेती अब भी वहीं के वहीं खड़ी है। उसमें दीर्घकालीन जरूरत के हिसाब से कोई योजना नहीं है। हमारी रोजमर्रा की जरूरत की खाद्य वस्तुएं भी कम उत्पादन, ज्यादा कीमतें और फिर ज्यादा उत्पादन कम कीमतों के लगातार चक्र में चलती रहती हैं। हमारे जैसा बड़ा देश बाजार और मानसून के भरोसे अगर अपनी खेती को रखेगा तो संकट खड़ा होगा ही।

इस साल बारिश कम हुई है और दालों की कीमतें ज्यादा हैं इसलिए अगले साल दालें ज्यादा पैदा की जाएंगी और कीमतें घटेंगी, लेकिन जब दालें उगाना कम फायदे का सौदा होगा और बारिश ठीक होगी तो किसान फिर दाल उगाना कम कर देंगे। इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक के अंत में यह संकट हमें चेता रहा है कि खेती पर ध्यान देना जरूरी है वरना जनता महंगाई झेलती रहेगी और नीति निर्माता विकास और मुद्रास्फीति का जटिल अंकगणित सुलझाते रहेंगे।

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