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लड़ें जाड़े के रोगों से

क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस
जाड़े के दिन। खड़-खड़ करती छाती, फूलती सांस, और उस पर रात-दिन उठती बलगम वाली खांसी। कुछ खुद का दोष, कुछ शहरों की जहरीली हवा का असर। इसी से उपजी क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस सांस की नलियों में पैदा होने वाली सूजन है। 40-50 की उम्र के पार उसके भुक्तभोगियों की तदाद लगातार बढ़ती जाती है। शुरू में रोग सिर्फ सर्दियों में ही अपने तेवर दिखाता है, पर धीरे-धीरे बारहों महीने तकलीफ देने लगता है। बार-बार खांसी उठती है, सांस छोड़ने-लेने में मुश्किल होती है, बलगम उतरती रहती है, दमा की तरह छाती घरघराने लगती है। सीटी जैसी ध्वनि सुनाई पड़ती है। फेफड़े पूरी मात्र में ऑक्सीजन जज्ब नहीं कर पाते, शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और दौड़ भाग कर काम करने की ताकत नहीं रहती। आप चाहें तो कुछ छोटी-छोटी सावधानियां और घरेलू उपाय अपना कर इसे वश में किया जा सकता है। 

बिगड़ने न दें सांस-नलियों की सेहत : उन सभी प्रदूषणकारी तत्वों से बचें जिनसे सांस-नलियों की सूजन और सिकुड़न बढ़ती है।

- धूल-धुएं से बच कर रहें

- अगर धूम्रपान करते हैं, तो उसे छोड़ दें।

- कमरे में कोई सिगरेट सुलगाए तो उसे मना कर दें। न माने, तो खुद उठकर बाहर चले जाएं।

- घर पर अंगीठी, चूल्हे और मिट्टी के तेल के स्टोव का प्रयोग बंद कर एलपीजी का इस्तेमाल करें।

- ठंड से बचाव रखें। जाड़े से खुद को बचा कर रखें, गर्म कपड़े पहनने में जरा भी ढील न बरतें। अगर ठंड बढ़ जाए तो कमरे में हीटर जला लें, और किसी चौड़े मुंह के बरतन में पानी रख छोड़ें। इससे हवा में नमी बनी रहेगी। धुआं, सीलन और तापमान के अकस्मात् परिवर्तन से खुद को बचाकर रखें। 

- डॉक्टर की मदद से श्वास-व्यायाम सीख लें और उन्हें नियम से रोज करें। इससे फेफड़ों की वायु ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। समय से रात्रिभोज करें। रात का भोजन सोने से कम-से-कम तीन घंटे पहले करें। डिनर करते ही सोने से पेट में बना एसिड पलट कर सांस-नलियों में जा सकता है जिसके फलस्वरूप सांस की नलियों में घमासान मच जाता है।     

सार्वजनिक स्थलों से दूर रहें। जिन दिनों आपके शहर में खांसी-जुकाम फैला हो, उन दिनों सिनेमाघर और प्रदर्शनियों जैसी भीड़ वाली जगहों में न जाएं। सांस-नलियों में जरा भी इन्फैक्शन होने से ब्रोंकाइटिस बिगड़ जाता है। वजन पर ध्यान दें। यदि वजन अधिक है तो उसे कम करें। अधिक वजन होने पर फेफड़ों का काम बढ़ जाता है। फेफड़े पहले से ही क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस से बेहाल हों, तो इतना उन पर रहम करें। 

खांसी से आराम पाएं
गुनगुने तरल पदार्थ लें और भाप सूंघें ताकि भीतर जमा बलगम तरल होकर बाहर आ सके। बलगम निकालने वाले महंगे खांसी के शर्बत किसी काम के नहीं होते। सांस उखड़े तो डॉक्टरी सलाह से ब्रोंकोडाइलेटर दवाएं, जैसे डेरीफाइलिन, एस्थलिन, टेड्राल आदि लें।

पीली बलगम खतरे का लक्षण
ध्यान दें कि जैसे ही बलगम का रंग पीला हो या बुखार आए तो डॉक्टर से सलाह लें। यह फेफड़ों में इन्फेक्शन होने का लक्षण है। इसे नजरअंदाज करने से फेफड़ों की बची-खुची क्षमता भी घट जाती है और स्थिति बिगड़ते देर नहीं लगती। इससे उबरने के लिए एंटीबायटिक दवा लें। सांस अधिक उखड़ने लगे तो तुरंत उपचार लें। कभी रोग बेकाबू होता लगे, तो एमरजेंसी समझकर तुरंत डॉक्टर से राय लें। कभी-कभी अस्पताल में कुछ समय के लिए भर्ती होकर ऑक्सीजन और दवाएं लेने की भी आवश्यकता पड़ सकती है।  

सामुदायिक प्रयास जरूरी
घास-पात जलाने पर सख्त पाबंदी, सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर रोक, यातायात वाहनों की उचित देखरेख और फैक्ट्रियों से प्रदूषण खत्म करने के उपाय फेफड़ों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है।

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