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सात दिन की देरी ने चलाया दो दशक का मुकदमा

एक बेवा की फरियाद इसलिए नहीं सुनी गई क्योंकि उन्होंने जवाब देने में सात दिन की देरी लगा दी। नतीजतन वे अपने हक की जमीन वापस पाने के लिए बीते करीब दो दशक से मुकदमा लड़ रही हैं। राजस्व परिषद ने महज सात दिन की देरी के तर्क के आधार पर इस बेवा का पक्ष न सुने जाने को नैसर्गिक न्याय के खिलाफ करार दिया है।

राजस्व परिषद के सदस्य (न्यायिक) संजय भूस रेड्डी ने ‘जमशेद बनाम निसार जहाँ’ के मामले में अपने फैसले में कहा है कि अधीनस्थ न्यायालय का इस बेवा का पक्ष न सुनना विधिक अधिकारों का भी हनन है। श्री भूसरेड्डी ने कहा है कि पुर्नस्थापन के ऐसे प्रकरण में अधीनस्थ न्यायालय को कठोर दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए।

पद्धति और प्रक्रिया- विधवाओं, विकलांग, महिलाओं, बच्चों और वृद्धजनों व गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों के मामले में विलम्ब को लचीले और सहानुभूतिपूर्वक दृष्टिकोण रखते हुए निर्णय लेना चाहिए। 

गौतमबुद्धनगर से जुड़े इस मामले के मुताबिक जुम्मा बख्श के निधन के बाद नियमानुसार उनकी भूमि उनके वारिसों सुलतान और उमेद खाँ के नाम दर्ज हुई। सुलतान की मौत के बाद उनकी बेवा निसार जहाँ का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज हुआ।

करीब दस साल बाद उमेद खाँ के पुत्र कलुवा ने नायब तहसीलदार के यहाँ एक अपंजीकृत फर्जी वसीयतनामे के आधार पर दाखिल खारिज का प्रार्थनापत्र दिया, जिसे नायब तहसीलदार ने स्वीकार कर राजस्व अभिलेखों से निसार जहाँ का नाम हटाकर उमेद खाँ के पक्ष में नाम किए जाने का आदेश 28 जून 1990 को परित किया।

इसकी सूचना निसार जहाँ को देर से मिली। उन्होंने अपीलीय न्यायालय में भूमि पर दोबारा अपना नाम दर्ज किए जाने का आवेदन किया लेकिन अपील यह कह कर निरस्त कर दी गई कि वह सात दिन विलम्ब से आई है।

इसके बाद मामला मेरठ के मण्लायुक्त कार्यालय पहुँचा जहाँ से अधीनस्थ न्यायालय को निसार जहाँ की बात सुनने का आदेश दिया गया। इस आदेश के खिलाफ कलुवा के पुत्र जमशेद ने अपर राजस्व परिषद की मेरठ सर्किट में अपील की।

मेरठ सर्किट में जब सुनवाई शुरू हुई तो निसार जहाँ के विरोधी पक्ष ने मामले को लटकाने की गरज से  इसे राजस्व परिषद मुख्यालय लखनऊ स्थानान्तरित करा लिया। मामला एक गरीब विधवा से जुड़ा होने के कारण सदस्य न्यायिक संजय भूसरेड्डी ने मामले को प्राथमिकता के आधार पर सुना।

उन्होंने सभी पक्षों को सुनने के बाद संबंधित नायब तहसीलदार की अदालत को आदेश दिया कि वह राजस्व अभिलेखों में पहले कौसर जहाँ का नाम बहाल करें। साथ ही उसकी मौजूदगी में पूरे मामले की पुन: सुनवाई कर दो महीने में मामले को निपटाएँ।

करीब डेढ़ महीने बाद इस मसले पर पुनर्विचार के लिए श्री भूसरेड्डी के पास आवेदन आया तो उन्होंने उसे निरस्त करते हुए इसे न्यायालय का समय बर्बाद करने की कुचेष्टा ठहराया और आवदेनकर्ता जमशेद पर एक हजार रुपए का जुर्माना लगाया।

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