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दो टूक (15 दिसंबर, 2009)

राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान सैलानियों के सामने राजधानी का चेहरा चमकाने की कवायद के तहत दिल्ली सरकार ने लो-फ्लोर बसें ली थीं। मगर ‘हिन्दुस्तान’ ने जब इन नई नवेली दुल्हनों की जंग से बदहाल सूरत सबके सामने रखी तो रखरखाव की कलई खुल गई। पिछले 18 दिनों में करीब तीन करोड़ रुपए की छह बसों का ‘धुआं निकल जाने’ के बाद सरकार इस मुद्दे की आंच महसूस कर रही है।

विपक्षी हमलों से सिटपिटाई सरकार का नजला आपूर्तिकर्ता कंपनी पर गिरा है। जांच और कार्रवाई की यह मुद्रा अच्छी है मगर इससे पता चलता है कि अगर वक्त पर आईना ना दिखाया गया होता तो कालीन के नीचे कूड़ा छिपाने की कवायद जारी रहनी थी भले पब्लिक के पैसे को ‘जंग’ खा जाता।

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