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पंख बंधा बिहार अब उड़ने को तैयार

यदि बिहार को एक विमान मानें तो वह अब रनवे पर उड़ान भरने के लिए तैयार खड़ा है। पर उसके पंख अब भी बंधे हुए हैं। उसे बस इंतजार है कि पंख खुलने का। बंद पंख के ताले की चाभी केंद्र सरकार के पास है।
बिहार की सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है। दूसरी बड़ी समस्या है बिजली की घोर कमी। ये दोनों बंद पंख हैं। दोनों समस्याओं का हल केंद्र सरकार के ही पास है।

गत मार्च में ही बिहार विधान मंडल ने बिहार विशेष अदालत विधेयक, 2009 पास करके राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भेज दिया था। उस पर आज तक केंद्र की सहमति नहीं मिल पाई है। दूसरी ओर बिहार में नये बिजली उत्पादन केंद्र लगाने के लिए कोल लिंकेज की सख्त जरूरत है। केंद्र सरकार इसकी भी अनुमति राज्य सरकार को नहीं दे रही है। बिहार सरकार की एक शिकायत यह भी है कि जल विद्युत परियोजना लगाने के लिए भी गंगा नदी के जल का इस्तेमाल करने की इजाजत केंद्र सरकार बिहार को नहीं दे रही है। बिहार सरकार की केंद्र से मांगें तो और भी हैं, पर फिलहाल उपयरुक्त दो महत्वपूर्ण हैं।
 
नीतीश सरकार ने पिछले चार साल में बिहार को जंगल-जंगलात के टेढ़े मेढ़े रास्ते से निकाल कर बिहार को उड़ान पट्टी तक पहुंचा दिया है। मौजूदा बिहार सरकार के कई कामों की सराहना खुद केंद्र सरकार और कांग्रेसी नेताओं ने भी समय-समय पर की है। कुछ का अनुसरण भी किया है। कोई भी निष्पक्ष व गैर राजनीतिक व्यक्ति इन दिनों जब बिहार आता है तो वह यही कहता है कि बिहार बदल रहा है। खुद बिहार सरकार, विकास की गति को और बढ़ाना चाहती है। इसे बढ़ाने की दिशा में बिजली की घोर कमी और सरकारी भ्रष्टाचार प्रमुख बाधाएं हैं।
 
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यह लगता है कि यदि राज्य सरकार में विभिन्न छोटे-बड़े पदों पर बैठे अफसरों व कर्मचारियों के बीच के भ्रष्ट तत्वों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान हो जाए तो सरकारी धन का अधिकांश जनता के काम में ही लगेगा। अभी स्थिति वैसी नहीं है। विकास बजट का आकार काफी बढ़ गया है, इसलिए बिचौलियों द्वारा लूट के बावजूद विकासात्मक काम पूरे राज्य में दिखाई पड़ रहे हैं। पर खर्च के अनुपात में काम कम है और कई जगह गुणवत्ता को लेकर भी सवालिया निशान लगाये जा रहे हैं। कड़े कानून के अभाव में नीतीश कुमार अपने ही भ्रष्ट अफसरों, कर्मचारियों व दूसरे तत्वों के सामने लाचार हैं। नीतीश कुमार मानते हैं कि बिहार विशेष अदालत विधेयक 2009 पर राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकेगा।
   
नब्बे के दशक में पटना  के हाई कोर्ट ने कई बार यह कहा कि बिहार में जंगल राज है। एक बार तो हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि जंगल के भी कुछ नियम होते हैं, यहां तो वह भी नहीं है। अदालत पूरे राज्य को लेकर अब ऐसी टिप्पणियां नहीं कर रही है। बिहार राजनीतिक संरक्षण प्राप्त माफियाओं के अपराध से वर्षो तक पीड़ित रहा था। नीतीश सरकार ने त्वरित अदालतों के जरिए वर्षो से लंबित आपराधिक मामलों की सुनवाई करवा कर करीब 38 हजार छोटे बड़े अपराधियों को सजा दिलवा दी। इससे आतंक का माहौल समाप्त हो गया है। इससे बिहार को जंगल राज से निकाल कर उड़ान पट्टी तक पहुंचाने में काफी सुविधा मिली है, पर सरकारी भ्रष्टाचार व बिजली की कमी इस पिछड़े प्रदेश को विकसित राज्यों की श्रेणी में नहीं लाने दे रहे हैं।
 
बिहार को जल्द से जल्द विकसित करके उसे विकसित राज्य बना देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं करने पर माओवादी हिंसा के बढ़ जाने का खतरा सामने है। यदि बिहार पर माओवादी छा गये तो पूरे देश पर छा जाने में उन्हें काफी सुविधा हो जाएगी। याद रहे कि भुखमरी से बचने के लिए कई जगह गरीब लोग माओवादियों की फौज में आसानी से शामिल होते जा रहे हैं, ऐसी खबरें भी मिल रही हैं। ऐसे उदाहरण भी मिले हैं कि बिहार के जिन इलाकों में प्रशासन ने भूमि समस्या का समाधान कर दिया है, वहां नक्सलियों की पकड़ कमजोर हुई है। दूसरी ओर बिहार के नेपाल की सीमा पर अवस्थित होने के कारण विदेशी आतंकवादियों की घुसपैठ की भी आशंका बनी रहती है। घुसपैठ होती भी रहती हैं।

नेपाल-भारत की सीमा खुली हुई है। सीमा पर तैनात भ्रष्ट सरकारी कर्मी राष्ट्रहित का ख्याल रखे बिना बेरोकटोक संदेहास्पद तत्वों को भी सामान के साथ प्रवेश करने देते हैं यानी बिहार का विकास अब सिर्फ राजनीतिक मुददा ही नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ मुद्दा बन गया है। इस सीमावर्ती अभागे प्रदेश का अब अधिक दिनों तक गरीब बने रहने देना पूरे देश के लिए शुभ नहीं है। हाल में केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा है कि माओवादी भारतीय सेना को ‘दुश्मन सेना’ कहने लगे हैं। अब भला माओवादी अपने कथित दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार कर सकते हैं, इस बात की कल्पना आसानी से की जा सकती है। राजनीतिक भेदभाव से ऊपर उठकर उसी अनुपात में सरकारी गैर सरकारी तैयारी की भी जरूरत है।

बिहार में हाल के वर्षो में जिन 38 हजार अपराधियों को निचली अदालतों ने सजा दी है उनमें आम अपराधियों के साथ साथ जातीय व सांप्रदायिक दंगे और नक्सली हिंसा के आरोपित भी शामिल हैं। यह अकारण नहीं है कि गत चार साल में बिहार में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। साथ ही नक्सली हिंसा भी घटी है, पर आम अपराध, जातीय व सांप्रदायिक दंगों और नक्सली हिंसा पर स्थायी तौर पर काबू तभी पाया जा सकेगा जब राज्य की गरीबी दूर हो। गरीबी तभी दूर होगी जब सरकारी धन वास्तव में वहीं खर्च हों, जहां के लिए वे आवंटित हैं। अभी तो काफी धन बिचौलियों की जेबों में जा रहा है। साथ ही नये बिजली उत्पादन केंद्रों की स्थापना में केंद्र सरकार बिहार की विशेष मदद करे।

जिस तरह आम अपराधी त्वरित अदालतों के कारण काफी हद तक काबू में हैं, उसी तरह का असर भ्रष्ट सरकारी अफसरों व कर्मचारियों पर भी होगा यदि बिहार विशेष अदालत विधेयक 2009 को क्रेद्र से मंजूरी मिल जाये। क्या केंद्र सरकार दलगत राजनीति से ऊपर उठकर बिहार को उड़ान भरने का मौका देगी?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

surendarkishore@gmail.com

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