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दिमाग का दायरा

यह तो हर कोई मानेगा कि सूचना और संचार में पिछले वर्षो में हुई क्रांति ने दुनिया को बदल डाला है, लेकिन इस क्रांति से हमें मिलने वाली सूचनाओं में कितनी बढ़ोतरी हुई है? वैज्ञानिकों ने हिसाब लगाया है कि सूचना और संचार माध्यमों से हमारे पास रोज लगभग एक लाख शब्द पहुंचते हैं। इनमें आपसी बातचीत में इस्तेमाल हुए शब्द शामिल नहीं हैं। अगर टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल वगैरह से मिले दृश्यों को भी शामिल कर लिया जाए तो लगभग 34 गीगाबाइट्स का डाटा रोज हमारे दिमाग तक पहुंचता है।

इतनी सूचना का फायदा कुछ भी हो, एक नुकसान यह हुआ है कि गहरे तक सोचने और महसूस करने की क्षमता कम हुई है, क्योंकि ज्यादातर डाटा सतही बातों को हम तक पहुंचाता है और इसकी मार इतनी तेज होती है कि लोग किसी बात पर गहराई से गौर ही नहीं करते। हालांकि मानव दिमाग की क्षमता इससे कहीं ज्यादा है और इस बात का खतरा नहीं है कि किसी कंप्यूटर की तरह दिमाग भी ओवरलोड हो जाए लेकिन लोगों की आपसी बातचीत करने, दूसरे की बातों पर गौर करने और कुछ गहरे निष्कर्ष निकालने की आदत कम हो गई है।

एक सवाल पर वैज्ञानिकों ने अभी ज्यादा काम नहीं किया है और उसी दिशा में उम्मीद की किरण भी है। सवाल यह है कि जो सूचना हमें मिलती है उसमें से कितनी हम निकाल देते हैं और कितनी दिमाग में स्टोर करते हैं। आखिरकार यह तो हमारा अनुभव है कि हम वही याद रखते हैं जो हमें जरूरी लगता है। वैज्ञानिक यह मानते हैं कि सूचना की इस बौछार से हमारे दिमाग की बनावट में कुछ स्थायी बदलाव हो सकते हैं। ये बदलाव कई तरह से हो सकते हैं, क्योंकि सिर्फ सूचना की मात्र ही नहीं बढ़ी है उसके माध्यम भी बदल गए हैं।

पहले ज्यादातर सूचना आसपास की दुनिया को देखने-सुनने से मिलती थी। छापाखाने के आविष्कार के बाद पढ़ने से काफी सारी सूचना मिलने लगी। अब कंप्यूटर या टीवी या मोबाइल के स्क्रीन से सूचना मिलती है। दिमाग में बदलाव जो भी हों यह तो तय है कि हमें आसपास के लोगों से संवाद और गहराई से सोचना और महसूस करना फिर से सीखना चाहिए क्योंकि इन्हीं चीजों ने तो हमें ऐसा आदमी बनाया जो ऐसे सूचना क्रांति कर सकता है और नए नए संचार के साधन बना सकता है।

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