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सूचना क्रांति के मारे ये बेचारे

हम मोबाइल टेलीफोन के विस्तार से खुश हो सकते हैं। आज हर बच्चे के हाथ में मोबाइल फोन है। कॉल रेट भी सस्ती हो गई हैं। इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है एसटीडी पीसीओ वालों पर। कभी उनके यहां दिन भर लाइनें लगी रहती  थीं लेकिन अब वहां कोई जाता तक नहीं। ये पीसीओ लाखों परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया थे। संचार क्रांति ने इन पीसीओ वालों की कमर तोड़कर रख दी है। कई परिवार तो भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। हालांकि ये वही लोग हैं जिन्होंने सूचना क्रांति के पिछले दौर को सर्वसुलभ करवाया था। अब एक विज्ञापन में एक बांसुरी वाला एसटीडी पीसीओ को चूहा बनाकर पहाड़ के नीचे नदी में धकेल देता है। लगता है पीसीओ वालों का भी यही हश्र होना है।
ललित भसोढ़, पहाड़ गंज, नई दिल्ली

हंगामे की वजह
महंगाई के जमाने में अलग राज्यों की मांग पर हल्ला कुछ अजीब लगता है। हल्ला मचाने वालों ने क्या जनता के पास जाकर पूछा है कि उसे फिलहाल क्या चाहिए? सस्ता अनाज या अलग राज्य? अलग राज्य जरूरी हो सकता है लेकिन मुङो लगता है कि इसका इस्तेमाल महंगाई से लोगों का ध्यान बंटाने के लिए किया जा रहा है। सरकार तो पहले ही कह चुकी है कि इस महंगाई को वह कम नहीं कर सकती इसलिए अब लोगों का ध्यान बंटाने का रास्ता ही उसे दिखाई दे रहा है।
विजय विश्वकर्मा, कर्मपुरा, दिल्ली

नेतागिरी के लिए
कुछ नेता जिनकी राजनीति बहुत ज्यादा नहीं चल पा रही। जिनको वोट देने वाले दो चार जिलों में बचे रह गए हैं, वे अलग राज्य की मांग को लेकर काफी बढ़चढ़ कर बोल रहे हैं। उन्हें लगता है कि अगर उनका इलाका अलग राज्य बना तो वे मुख्यमंत्री तो अवश्य ही बन जाएंगे। अभी तो उन्हें मंत्रिपद भी नसीब नहीं हो रहा। छोटे राज्यों की मांग में दम हो सकता है लेकिन ऐसे स्वार्थ ने इस मांग को बेमतलब बन दिया है।
फुरसत मुरादाबादी, राज नगर, गाजियाबाद

घायल क्यों हुए वे
युवराज सिंह मोहाली में बहुत अच्छा खेले लेकिन उसके तुरंत बाद ही खबर आ गई कि उनकी अंगुली में चोट लग गई है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ, कई बार पहले भी ऐसा हो चुका है कि खिलाड़ी मैच में बहुत अच्छा खेलता है और फिर पता पड़ता है कि वह घायल हो गया। सफलता के बाद ऐसी चोट पता नहीं कब और कहां लग जाती है। बेहतर होगा कि जिन खिलाड़ियों को ज्यादा चोट लगती है उन्हें सेहत सुधारने के लिए एक साल की छुट्टी दे दी जाए।
राकेश धीरज, संत नगर, दिल्ली

जागरूकता से खत्म होगा दहेज
तकनीक के मामले में भले आज हम आधुनिक हो गए हैं, लेकिन सामाजिक सोच की लिहाज से हमारा मानसिक विकास नहीं हो पाया है। ऐसा भी नहीं है कि इस दिशा में सरकारी प्रयास नहीं हो रहे, लेकिन कानून के रखवालों की उदासीनता इस कुरीति के जड़ से समाप्त न होने का कारण बन रही है। दहेज के कीड़े को मारने के लिए कानून के साथ सामाजिक जागरूकता लाने की भी जरूरत है।
मीनाक्षी सक्सेना, नई दिल्ली

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