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चाुगाड़ की उम्मीद पर खड़ा दावेदार

शरद पवार राजनीति में जुगाड़परक विचारधारा के प्रतीक हैं। क्रिकेट से लेकर राजनीति तक सब जगह उनका जुगाड़ है। महारत ऐसी कि पार्टी तोड़ने और छोड़ने में भी वे देर नहीं लगाते। उनके बारे में महाराष्ट्र में मशहूर है कि वे दिन में साहू, फूले और अम्बेडकर और रात में मित्तल, बजाज और किर्लोस्कर हैं। उनकी जुगाड़ियत का ही कमाल है कि उनके दोस्त हर पार्टी में हैं। कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर शिव सेना तक में। इसी जुगाड़ के दम पर उन्होंने प्रधानमंत्री का सपना पाल रखा है। वे सोच रहे हैं कि यदि लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व में सरकार नहीं बनती है तो वे तीसर मोर्चे में जुगाड़ बिठाकर इस पद तक पहुंच सकते हैं। मराठी मानुष के नाम पर शिवसेना भी उनका समर्थन कर सकती है। वैसे जुगाड़ू राजनीति के चलते ही शरद पवार राष्ट्रीय नेता नहीं बन पाये। तमाम संभावनाओं के बावजूद वे महाराष्ट्र के बाहर अपना जलवा नहीं दिखा पाये। महाराष्ट्र के पुणे जिले के बारामती में 12 दिसम्बर 10 में जन्मे पवार पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा में 1में बारामती विधानसभा सीट से पहुंचे और राज्यमंत्री बने। जिन यशवंत राव चह्वाण के दम पर वे राजनीति करते थे, उन्हीं को गच्चा देकर उन्होंने कांग्रेस में विद्रोह कर दिया और जनता पार्टी से जुगाड़ कर पहली बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। 10 में इन्दिरा गांधी की वापसी के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। बारामती लोकसभा सीट से 1में वे पहली बार संसद पहुंचे। 1में महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में उनकी पार्टी कांग्रेस (एस) ने 54 सीटें जीतीं। उन्होंने राज्य में अपनी सक्रियता बनाये रखने के लिये लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया और विधानसभा में विपक्ष के नेता बन गये। 1में वे कांग्रेस में लौट आये। 1में राजीव गांधी ने मुख्यमंत्री शंकर राव चह्वाण को केंद्रीय वित्तमंत्री पद की शपथ दिलाई तो शरद पवार को मुख्यमंत्री बना दिया। 10 में शिवसेना और भाजपा गठबंधन के कारण कांग्रेस को राज्य में बहुमत नहीं मिला। पवार 14 निर्दलीयों का जुगाड़ कर फिर राज्य के मुख्यमंत्री बन गये। राजीव गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद के लिये नरसिम्हा राव, अजरुन सिंह के साथ पवार का नाम भी चला, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। 1में राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने पवार को रक्षा मंत्री बनाया। दो साल रक्षा मंत्री रहने के बाद जब सुधाकर राव नाइक को मुख्यमंत्री पद से हटाया गया तो पवार को फिर महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। पवार को इस दौरान मुंबई सीरियल ब्लास्ट, जीआर खरनार, अन्ना हाार के उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप और जलगांव सेक्स कांड, नागपुर में गौरी समुदाय के प्रदर्शन में मची भगदड़ में 114 लोगों की मौत जसे मसलों को झेलना पड़ा। नतीजतन उनकी लोकप्रियता को बट्टा लगा। इन्हीं सब के चलते 1में हुए विधानसभा के चुनाव में पवार को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1में हुए आम चुनाव में उन्होंने बारामती से लोकसभा का चुनाव लड़ा और उसके बाद से वह राज्य विधानसभा में नहीं लौटे। 1में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में सीताराम केसरी को ललकारा। तेरहवीं लोकसभा गठन से पहले उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा पार्टी में उछाला। नतीजतन कांग्रेस में उनका समर्थन करने वाला उन्हें नहीं मिला तो 1में पीए संगमा और तारिक अनवर के साथ उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बना ली। इसी दौरान जून 1में महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव हुए, उसमें कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर वहां सरकार बनाई। 2004 के बाद पवार ने यूपीए ज्वाइन किया और मनमोहन की सरकार में उन्हें कृषि मंत्री बनाया गया। 2005 में वे जगमोहन डालमिया जसी हस्ती की मर्जी के बिना बीसीसीआई के अध्यक्ष चुने गये। वे कृषि मंत्री हैं लेकिन उनके ही राज्य में सूखे के चलते बड़ी संख्या में किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।

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