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जसवंत और आडवाणी एक-दूसरे से हुए मुखातिब

जसवंत और आडवाणी एक-दूसरे से हुए मुखातिब

भाजपा से निष्कासित किए जाने के बाद वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह और विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी सोमवार को पहली बार एक दूसरे से रू-ब-रू हुए।

लोकसभा में शून्यकाल के दौरान जसवंत सिंह ने गोरखालैंड पृथक राज्य से संबंधित मुद्दा उठाया और आडवाणी से सीधे मुखातिब होते हुए कहा, मैं अपने पूर्व सहयोगी, जिनके साथ 30 साल तक काम करने का मुझे सौभाग्य मिला है, मैं उनसे आग्रह करता हूं कि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा द्वारा शुरू की गई हड़ताल और आंदोलन को समाप्त करने और सरकार की ओर से गोजमो को बातचीत का न्यौता दिए जाने के संबंध में सदन द्वारा कोई अपील जारी करने में वह भी साथ दें। भाजपा के घोषणापत्र में भी गोरखालैंड पृथक राज्य की बात कही गई है।

इस पर आडवाणी ने अपने संक्षिप्त जवाब में कहा, मेरे साथी जसवंत सिंह ने मेरा उल्लेख किया है। उन्होंने हमारे घोषणापत्र में गोरखालैंड के उल्लेख की बात भी कही है। सोमवार शाम गोजमो का शिष्टमंडल मुझसे मिलने आ रहा है।

पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद संसद के बाहर या भीतर दोनों नेताओं के बीच किसी तरह का यह पहला संवाद था। दोनों ही नेता पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में टिप्पणियां किए जाने के कारण आरएसएस की मार झेल चुके हैं। आडवाणी को जहां पार्टी अध्यक्ष पद से हटना पड़ा था वहीं जसवंत को भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से ही हाथ धोना पड़ा।

लोकसभा चुनाव में जसवंत भाजपा के टिकट पर दार्जिलिंग सीट से विजयी हुए हैं। पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद जसवंत पहली बार सदन में बोले हैं। निष्कासन से पहले पार्टी ने उन्हें संसद की लोक लेखा समिति के लिए नामित किया था और वरिष्ठतम सदस्य होने के कारण परंपरा के अनुरूप उन्हें इसका अध्यक्ष बनाया गया। पार्टी से निष्कासित किए जाने पर भाजपा ने उनसे इस पद से हट जाने का आग्रह किया जिसे उन्होंने सीधे तौर पर ठुकरा दिया। वे अभी भी इस पद पर आसीन हैं।

जसवंत ने मांग की कि सरकार आंदोलनकारी गोजमो से बातचीत शुरू करे। वाम दलों के सदस्यों ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया।

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