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आतंकवाद में साहित्य

छब्बीस ग्यारह हो गया। लाहौर हो गया। कहां-कहां क्या-क्या तो हो गया? बीरविहीन मही मैं जानी। मुंबई में तीन दिन तीन रात आतंकी खेल चला। लाहौर में सुबह जरा सी देर में आतंकवादियों ने खेल कर दिया। कई खिलाड़ी घायल हो गए। खेला बंद हो गया। टीम लौट गई। पत्रकार बोले क्योंकि वे तो बोलते ही हैं, लकिन जिनका संवेदनशील हृदय पशु-पक्षियों में, पेड पौधों में, कंकड़ पत्थर में भक्ित अध्यात्म ढूंढ़ निकालता है, जो ‘वहां’ पहुंचता है ‘जहां’ रवि तक नहीं पहुंचता। हिन्दी का ऐसा सजग चौकन्ना संवेदनशील साहित्यकार कुछ नहीं बोला है। बिंदास को चिंता हुई। कोई बात तो होगी! मगर क्या? बात है। कही नहीं जाती है। बिना कहे ही समझी जाती है। हिन्दी की तीनों पीढ़ियों के जीवित अथवा सद्य:विसर्जित कवि कथाकार आलाचक इससे ज्यादा विधाएं इन दिनों चलन में नहीं हैं इन दिनों एकांत सेवन कर रहे हैं वे अपने अपने एकांत में हैं जैसे मुक्ितबोध का ‘अंधेरे में’ का नायक जो अंधेरे बंद कमरे में चक्कर लगान का शौकीन है। उपमा गलत है। अपने अंधेरे को एंजाय करता साथी कहता है कि हे बिंदास उपमा तो ठीक दे। एकांत के अपने मजे होते हैं। तू क्या जाने जो हर वक्त लिखता बोलता रहता है। एकांत अनेकार्थी है। बीबी ने लात लगा दी तो एकांत हो गया। संपादक ने न पूछा तो एकांत हो गया। मिलता अकादमी न मिला तो ‘शून्यमिदं’ हो गया । इसलिए बिंदास-गुंताड़ा यही है कि हे साथी! तेरी इस चुप्पी का भी एक अर्थ नहीं है। ‘अर्थबहुलत्व-अर्थलचकत्व-अर्थलपकत्व’ के इस त्रिधा उत्तर आधुनिक समय में जब एक आतंकवादी का एक मानी नहीं होता तब एक साहित्यकार के मौन का अर्थ कैसे एक-सा हो सकता है? बिंदास के बहुत शोध करने पर हिंदी के साहित्यकार के आतंकवाद को लेकर निम्न रुझान पाए गए। रुझान नंबर एक : दयाभाव एक औसत साहित्यकार आतंकवादी को दया की दृष्टि से देखता है। उसे उसकी हालात पर तरस आता है। ये क्या हो गया इस लड़के को? गुमराह लोग हैं। दु:खी जन पर करो करुणा..। रुझान नंबर दो : वीर भाव दबा छिपा! यह साहित्यिक अंतर्विरोध है। कुछ-कुछ काव्यरुढ़ि की तरह। आतंकवादी को देखते ही धीरललित धीरप्रशांत भाव में रहने वाले अचानक अपने लुप्त हो गए वीर भाव को उचित आलंबन पाकर जागता महसूस करते हैं। ‘चढ़ चेतक पर’ तलवार उठान का मन करता है । ‘भूतल का पानी’ रखने वाली लाइनें कौंधती हैं मगर क्या करें? बंदूक की जगह किस्मत ने निकम्मा देख दो रुपए वाली कलम हाथ में दे दी और किशोरावस्था में एक अधपढ़ बीबी चार बच्चे। रंगा मजबूर! इसीलिए साहित्य से वीर रस का विस्थापन हो गया। रुझान नंबर तीन : ईष्र्या भाव पाया गया है कि साहित्यकार आतंकवादी से जलता है। इसीलिए उस पर कुछ नहीं लिखता है। डर लगता है कि कहीं आतंकी अमर न हो जाए! यह एक क्रिएटिवली एक्िटव भाव है। इसमें बड़ा पोटेंशियल है। यह साहित्यिक संभावनाओं के द्वार खोलती एक साहित्यिक स्थिति है। ईष्र्या का कारण साफ है : आतंकवादी एक बंदूक दिखाकर इधर-उधर दन्नाकर खूनखराबा करके इतना कवरेज फ्री में ले लेता है और हम जो साहित्य में दिन-रात लालक्रांति और रक्तक्रांति करते रहे एक लाइन नहीं ले पाए। यह अन्याय है। हमें अखबार में जगह नहीं मिलती। टीवी उन्हें ही दिखाता रहता है। कविता नहीं दिखाता। रुझान चार : ‘है गर्वभरा मदमाता’ पर इसे भी लेन को दे दे। ऐसा गर्वीला-गर्मीला साहित्य वहीं-वहीं बचा है जहां-जहां साहित्य ने स्वयं को आतंकवादी की कोटि में मान रखा है। साहित्य सोचता है कि आतंकवादी पाकिस्तान से बंदूक लेकर तांडव करता है साहित्य ने तो देसी दो रुपए वाली कलम से ही तांडव कर रखा है : ‘एक हिलोर इधर से आए एक हिलोर उधर से आए’ और ‘धुआंधार जग में छा जाए’! बताइए बंदूक बड़ी है या कलम? साहित्य का अपना आतंक हेाता है। साहित्यकार का अपना। इसे देखना हो तो उसकी बीबी से पूछो उसके बच्चों से पूछो। उसके कमजोर साहित्यिक दुश्मनों से पूछो। यह अध्ययन सिद्ध करता है कि अगर आतंकवाद को लेकर साहित्यकार नहीं बोलते तो उसके ठोस कारण हैं। हिन्दी वाल को ‘अनधिकार चेष्टा’ के नायक गध के मौन न रहने पर हुई दुर्गति याद है! इसलिए हे साथी तेरा ऐसा मौन सब भांति मूल्यवान है! कहा भी है : रहिमन चुप ह्वै बैठिए.।

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