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बहुत खतरनाक है यह आग

तेलंगाना की आग ने एक बार फिर नेहरूजी की याद ताजा कर दी। आंध्र प्रदेश के अलग राज्य बनने के बाद नेहरूजी ने कहा था कि ‘हमने बर्र के छत्ते में हाथ लगा दिया है और हम सब लोगों को ये बर्र आने वाले दिनों में डसने वाले हैं।’ तेलंगाना के मसले पर अभी ये तय नहीं हुआ है कि वह अलग राज्य बन ही जायेगा। जिस तरह से तेलंगाना से अलग इलाकों के नेताओं ने इस्तीफे देने शुरू किए हैं, उससे इसके लटक जाने की आशंका बढ़ गयी है। लेकिन इसने एक ऐसे जिन्न को जन्म दे दिया है जो आने वाले दिनों में सरकार को डंक मारता रहेगा।

हरित प्रदेश, गोरखालैंड, विदर्भ और बुंदेलखंड की मांगों को एक बार फिर नयी जिंदगी मिल गयी है। मायावती ने भी ऐलान कर दिया है कि उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों में बांट देना चाहिये। ऐसे में नेहरू की बात समझ में आती है। नेहरू को भारत की विविधता में एकता का आनंद आता था। वे कहते थे कि ‘जिंदा भाषाएं जीवन के समान होती हैं।’ लेकिन आजादी के बाद भाषा के आधार पर राज्यों की बनावट के वे सख्त खिलाफ थे। इस मसले पर वे न तो अपनी पार्टी कांग्रेस के साथ थे और न ही वे गांधीजी की बात मानने को तैयार थे। कांग्रेस ने 1917 में ही भाषा के आधार पर राज्यों के निर्माण का वादा किया था। जबकि गांधीजी ने 1948 में कहा था कि ‘हमें भाषा को केंद्र में रखकर राज्यों को बनाने में तत्परता दिखानी चाहिए।’

जहां गांधीजी को भाषा में एकता के सूत्र दिखायी पड़ते थे और वे कहते भी थे कि ‘जिंतनी भाषाएं उतने ही प्रांत होने चाहिए।’ लेकिन गांधी के तमाम जोर देने के बावजूद नेहरू अपनी बात से टस से मस नहीं हुए। नेहरू की सोच के दो सिरे थे। एक विशुद्ध व्यावहारिक और दूसरा वैचारिक। नेहरू विभाजन की आग से जले हुये थे। उनको ये डर सताता था कि जब धर्म लोगों को नहीं जोड़ पाया और पाकिस्तान बनने पर लाखों लोगों का खून बहा तो ऐसे में भाषा के आधार पर विभाजन रक्तपात की एक और उर्वर जमीन तैयार करेगा जिसको संभालना नामुमकिन हो जायेगा। और न जाने कितने पाकिस्तान बन जायेंगे। उनकी नजर में नये राज्यों की मांग भारत की एकता के लिये ही खतरा है। इसलिये 1952 में जब पोट्टि श्रीरामुलू अलग आंध्र प्रदेश के लिये आमरण अनशन पर बैठे तो नेहरूजी ने तबके मद्रास के मुख्यमंत्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को चिट्ठी लिखी। ‘अनशन के मुतल्लिक मुझे ढेरों टेलिग्राम मिल रहे हैं, पर मुझ पर इसका कोई असर नहीं होने वाला और मैं आप को भी यही सलाह दूंगा कि आप भी इसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दें।’ तब तक श्रीरामुलू को आमरण अनशन पर बैठे छह सप्ताह हो चुके थे और उनकी हालत खराब होने लगी थी। आंध्र के इलाकों में हिंसा फैलने लगी थी।
नेहरू की वैचारिक राय वामपंथ से प्रभावित थी। उनको लगता था कि जाति, धर्म और भाषा ये पहचान के वे आवरण हैं जो राष्ट्रीयता को कमजोर करते हैं और भारत जैसा नया नवेला देश तभी मजबूत बनेगा जब इसकी राह में अस्मिताओं की बाधाएं न हों। वे चाहते थे कि राज्यों के निर्माण के कारण और पहचान के बिंदु आर्थिक और प्रशासनिक हों ताकि अस्मिताओं के टकराव की संभावना न बने। और जैसे-जैसे सेकुलर पहचान के बिंदु मजबूत होते जायेंगे भारत नाम का राष्ट्र मजबूत होता जायेगा।

लेकिन मार्क्सवादियों की तरह नेहरू भी अस्मिताओं की ताकत और इसके भावनात्मक ज्वार को बढ़ने से रोकने में नाकामयाब रहे। ये महज इत्तफाक नहीं है कि राजगोपालाचारी को श्रीरामुलू के अनशन को नजरअंदाज करने की सलाह देने वाले नेहरू महज दस दिन के अंदर ही यह कहने को मजबूर हो गये कि आंध्र की मांग मानने का वक्त आ गया है अन्यथा आंध्र के इस तूफान को रोकना असंभव होगा। 12 दिसम्बर को नेहरू ने यह कहा और वे इस दिशा में कुछ कर पाते कि 15 दिसम्बर को श्रीरामुलू की मौत हो गयी और आंध्र जलने लगा। 17 दिसम्बर को नेहरू को अलग आंध्र प्रदेश के निर्माण का ऐलान करना पड़ा।

आंध्र की चिंगारी सिर्फ वहीं तक नहीं रुकी। मुंबई तक जा पहुंची और वहां भी मराठी और गुजराती के नाम पर नये प्रांत बन गये और मुंबई किसके साथ रहे इस पर भारी बवाल मचा। चिंगारी ने पंजाब तक का भी सफर तय किया। पंजाब, हिमाचल और हरियाणा नये राज्यों का जन्म हुआ। उधर बिहार में झारखंड, मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड की मांगों ने भी जोर पकड़ा। उत्तर-पूर्व में कई नये राज्यों को आकार मिला और यह सब तब हुआ, जबकि भारतीय राजनीति के तीन अति महत्वपूर्ण धड़े इसके सख्त खिलाफ थे। नेहरू की तरह ही वामपंथी भी कभी भी इसके पक्ष में खुलकर सामने नहीं आये। आज भले ही बीजेपी तेलंगाना के साथ खड़ी हो, लेकिन आरएसएस प्रमुख गुरुजी गोलवलकर का साफ मानना था कि ‘भाषाई प्रांतवाद देश की एकता के लिये खतरा है।’ मई 1954 को गोलवरकर ने कहा कि ‘अनेकता अराजकता की जननी है,..अपने को तमिल, मराठी और बंगाली के तौर पर देखना देश की ऊर्जा को नष्ट करना है।’

यह सही है कि आज के संदर्भ में भाषा की जगह इलाकाई अस्मिता ने ले ली है। तेलंगाना और विदर्भ की मांग भाषाई अस्मिता की खोज नहीं है। इनकी पीड़ा कहती है कि नया राज्य बनने के बाद भी एक भौगोलिक इकाई विशेष के राजनेताओं ने दूसरी भौगोलिक इकाई के साथ सौतेला बर्ताव किया और विकास के मसले पर उन्हें नजरअंदाज किया। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या इस तर्क को बल प्रदान करती है। तेलंगाना को भी लगता है कि रायलसीमा और तटीय आंध्र के लोगों ने मलाई काटी और उसके हिस्से में आया खाली कटोरा। यह आग भी कम खतरनाक नहीं है, क्योंकि अस्मिता होती विनाशकारी ही है। ऐसे में जरूरी यह है कि दिल्ली के हुक्मरान विकास का वो ब्लूप्रिंट तैयार करे जिसमें हर प्रांत और इलाके के लोगों की बराबर की भागेदारी हो और उन्हें ये लगे कि विकास का फल सिर्फ कुछ लोगों के लिये ही नहीं, बल्कि सबके लिए है और तब शायद किसी नेहरू और गोलवलकर को ये न कहना पड़े कि भाषाई और इलाकाई अस्मिता देश को कमजोर करेगी।
लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर हैं
ashutosh@network18online.com

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