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उर्दू मीडिया: मुसलमान चुनौती स्वीकार करें

ऐसा कम ही होता है कि मुस्लिम वर्ग से जुड़े कई मुद्दे कई दिनों तक एक साथ अखबारों की सुर्खियां बटोरते रहें। लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट पर पार्लियामेंट के दोनों सदनों में बहस, किसी काबिल मुसलमान को देश का प्रधानमंत्री बनाने पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की राय, मनमोहन सिंह का पार्लियामेंट के इसी सत्र में रंगनाथ मिश्र कमीशन रिपोर्ट पेश करने का ऐलान, अफगानिस्तान व पाकिस्तान पर जंग थोपने के लिए नई अफगान पॉलिसी पेश करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को नॉबेल शांति पुरस्कार से नवाजना और तेलंगाना प्रदेश में हैदराबाद को शामिल करने को लेकर छिड़ा विवाद। ये ऐसी घटनाएं हैं जिस पर उर्दू अखबार लगातार खबरें, लेख, संपादकीय छाप रहे हैं।

अधिकतर अखबारों ने लिब्रहान रिपोर्ट पर सदन में बहस को समय और पैसे की बर्बादी बताया है। रिपोर्ट की खामियों को आधार बनाकर अरुण जेटली का इसे राष्ट्रीय लतीफा करार देना भी अखबारों को पसंद नहीं आया। एक अखबार ने अपने संपादकीय ‘बीजेपी की सीनाजोरी’ में भाजपा लीडरों के बारे में कहा है। ‘लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट मंजर-ए-आम पर आने के बाद बाबरी मस्जिद की शहादत में अपने मुजरिमाना रोल के लिए शर्मिंदा होने की बजाय पार्लियामेंट के दोनों सदनों में भाजपा सदस्य न सिर्फ थाली पीटते रहे। उलटा दूसरों से माफी मांगने की मांग करते रहे।’ एक अन्य अखबार इस मसले पर कहता है-‘कैसी तन्हा है इन दिनों बीजेपी।’ ‘सियासत’ ने पार्लियामेंट में रिपोर्ट पर बहस के दौरान मस्जिद ढाने वालों के विरुद्ध किसी तरह की कार्रवाई का भारोसा नहीं जताने पर केंद्र सरकार की आलोचना की है।’ अपने संपादकीय ‘ये कैसी सियासी गलती’ में कहा है-‘लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट पर पार्लियामेंट में बहस का अफसोसनाक पहलू यह है। हुकूमत और इसके लोग मस्जिद की शहादत के गुनाहगारों की निशानदेही कर उन्हें कानूनी दायरे में लाने वाले फैसले का ऐलान करने की बजाय सिर्फ पुरानी घटनाएं बयां करते रहे।’ अखबार की राय में होना यह चाहिए था। बाबरी मस्जिद में 1949 में मूर्ति रखवाने, 1986 में मस्जिद का ताला खुलवाने और मस्जिद की सुरक्षा में नाकाम रहने को लेकर उर्दू अखबार तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव और कांग्रेस को भी बख्शने के मूड में नहीं दिखते। ऐसे समय में राहुल गांधी का बयान आना कि ‘अहल मुसलमान भी मुल्क का वजीर-ए-आजम बन सकता है,’ कांग्रेस के लिए थोड़ा राहत की बात रही। ज्यादातर अखबारों ने इसे सकारात्मक ढंग से लिया है। अखबार कहते हैं। हमें राहुल की बातों को चैलेंज की तरह लेना चाहिए। मेहनत, तालीम, लगन, तंजीमी, सियासी ऐतबार से लायक बनकर दिखाना होगा। पीएम न भी बनें देश के लायक शहरी तो बन ही जाएंगे। एपीजे अब्दुल कलाम साइंसदां हैं। फिर भी देश के सदर बने। ‘हमारा समाज’ कहता है- सलाहियत के बिना पर ही तीन मुसलमान राष्ट्रपति चुने गए। शिक्षाविद हामिद अंसारी आज उपराष्ट्रपति हैं। ‘सहाफत’ का लखनऊ संस्करण अपने संपादकीय ‘..खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता’ में मुस्लिम लीडरों को आड़े हाथ लेते हुए कहा है। मुल्क के सदर बनने वाले मुसलमानों ने अपनी कौम के नौजवानों को अपने जैसा बनने की कभी पहल नहीं की। राजस्थान में बरकतुल्लाह, महाराष्ट्र में अब्दुल रहमान अंतुले, बिहार में अब्दुल गफूर और असम में अनवर तेमूर मुख्यमंत्री बने। उन्होंने भी ऐसी कोई कोशिश नहीं की। आखिर अब तक कोई मुसलमान मुल्क का प्रधानमंत्री क्यों नहीं बना। जब फरूखद्दीन अली अहमद, डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसी शख्सियत मुल्क का सदर बन सकती है। किसी मुसलमान के प्रधानमंत्री बनने में कहां अड़चन रही? एक अखबार कहता है- ऐसा सामूहिक प्रयास से ही संभव है। इंदिरा गांधी ने तमाम विरोध के बावजूद डॉ. जाकिर हुसैन को देश का राष्ट्रपति बनाया था। अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले डॉ. मनमोहन सिंह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विशेष प्रयासों से दोबारा प्रधानमंत्री बने हैं। सभी दलों को ऐसा ही हौसला मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने पर दिखाना होगा। रोजनामा ‘राष्ट्रीय सहारा’ शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे के उस बयान को सही नहीं मानता जिसमें कहा गया है मुस्लिम पहले अध्योध्या में राममंदिर बनाने, कॉमन सिविल कोड, परिवार नियोजन, वंदेमातरम् गाने, धारा 370 हटाने में सकारात्मक भूमिका निभाएं तभी किसी काबिल मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है। ‘सहाफत’ कहता है। खुद शिव सेना का वजूद खतरे में है। पार्टी महाराष्ट्र से सिमट कर मुंबई कारपोरेशन तक सीमित हो गई है। एक अन्य अखबार कहता है। मराठी मानुस का फंडा जब फेल हो गया तो उन्हें हिन्दुत्व की याद आने लगी है। रोजनामा ‘ रोजशनी’ अपने संपादकीय में कहता है, ‘मुसलमानों में एकजुटता हो तो हर मसले को आसान बनाकर मंजिल के करीब पहुंचा जा सकता है।’
मलिक असगर हाशमी, लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं
malik_hashmi64@yahoo.com

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