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जीने की कला

दुनिया में दो तत्व हैं पदार्थ और उपभोक्ता। उपभोक्ता का जीवन पदार्थ पर आश्रित है। जहां दो का संबंध है वहां पदार्थ पदार्थ है और उपभोक्ता उपभोक्ता। उनमें स्वामी-सेवक का कोई संबंध नहीं है, दोनों स्वतंत्र हैं। उपभोक्ता और पदार्थ वैसे दोनों बराबर हैं किंतु जो व्यक्ति पदार्थ को ही सब कुछ मानकर चलता है वह पदार्थ का सेवक बन जाता है, उसका सर्वस्व पदार्थ ही बन जाता है।
धर्म ने स्वामी बनने की जो कला सिखाई, वह कला यह है कि तुम पदार्थ का भोग करते हो, वह तुम्हारी आवश्यकता है किंतु पदार्थ से प्रतिबद्ध मत बनो। पदार्थ को पदार्थ रहने दो, चेतना को चेतना रहने दो। यह बीच का जो सूत्र है उसे तुम काट दो, तुम स्वामी बन जाओगे। यह स्वामी बनने की कला है। जहां आवेग-आवेश नहीं होता, मूर्च्छा नहीं होती, वहां सहज शांति का उद्भव होता है। हम जो भी काम करें, मूर्च्छा से मुक्त रहकर करें। जहां मूच्र्छा सघन होती है, वहां पदार्थ एक उपाधि बन जाता है। मुनि को वस्त्र की आवश्यकता थी। आचार्य ने उसे नए वस्त्र दिए। कुछ दिन बीत गए। आचार्य ने देखा- मुनि ने वस्त्र नहीं ओढ़ा है, आखिर गया कहां? उसकी गठरी को खोलकर देखा। वस्त्र भीतर सहेज कर रखा हुआ पड़ा है। बहुत सारे लोग नए वस्त्र इसलिए काम में नहीं लेते कि काम लेने से खराब हो जायेगा। खराब हो जायेगा तो रखते क्यों हो? पास में रखने का उद्देश्य क्या है? कोई उद्देश्य नहीं होता पर यह सारा मूर्च्छा के कारण होता है। प्रत्येक साधक और धर्म का आराधक इसके प्रति जागरूक रहे। उपयोगिता हो, आवश्यकता की पूर्ति हो और साथ में मूर्च्छा न बढ़े। इस सूत्र को पकड़ोगे तो सचमुच तुम्हारा यह प्रश्न समाहित होगा कि धर्म मुझे क्या देगा। धर्म ऐसा सूत्र देगा, जिसके द्वारा तुम्हारा जीवन स्वतंत्र बनेगा, चेतना स्वतंत्र रहेगी। तुम्हारा स्वामित्व अक्षुण्ण रहेगा, कभी तुम्हें सेवक बनने का मौका नहीं मिलेगा। तुम अपनी स्वतंत्रता को, अपने स्वामित्व को सदा अखंड रख सकोगे।

 

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