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इतिहास में थोपे गए बहादुर हैं नाना साहब!


विवादास्पद पुस्तक ‘आल्हा-ऊदल और बुंदेलखंड’ के लेखक कौशलेंद्र प्रताप यादव ने स्थापित ऐतिहासिक मान्यताओं को बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। झाँसी की रानी को झूठी वीरांगना बताने और क्रांतिकारी मंगल पांडे की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका को नकारने के साथ उन्होंने 1857 के गदर में अहम भूमिका निभाने वाले बिठूर के नाना साहब के चरित्र पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। उनके अनुसार पेशवा ने ब्रिटेन की महारानी से गिड़गिड़ाते हुए माफी माँगी थी। 

विवादास्पद पुस्तक आल्हा ऊदल और बुंदेलखंड के चेप्टर ‘1857 की झूठी वीरांगना : रानी लक्ष्मीबाई’ के 49वें पेज में लिखा है कि ‘रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही एक अन्य थोपे गए बहादुर हैं नाना साहब’। नाना साहब पेशवा बाजीराव द्वितीय के पुत्र थे।

अंग्रेजों ने जब उनकी पेंशन बंद कर दी तब उन्होंने अपने चतुर वकील मुंशी अजीमुल्ला को कोर्ट आफ डायरेक्टर्स के सामने पेश होने के लिए लंदन भेजा। अजीमुल्ला काफी दिनों तक पेशवा की पेंशन के लिए डायरेक्टर्स के सामने रोते रहे। वापस आते समय क्रीमिया के रणक्षेत्र में गुहार लगाने उमर पाशा से भी मिले, किंतु बात नहीं बनी।

किताब के अनुसार ‘पेशवा को अपनी पेंशन और बिठूर की गद्दी इतनी प्यारी थी कि वह जान बचाकर 1858 में नेपाल भाग गए थे और वहाँ से भी पत्रों के माध्यम से ब्रिटेन की महारानी से गिड़गिड़ाते रहे। इन पत्रों को प्रकाश में लाने का सराहनीय प्रयास किया है वरिष्ठ इतिहासकार रामशरण जोशी ने।

ब्रिटेन की महारानी को एक पत्र में नाना साहब लिखते हैं कि, ‘आपने हिन्दुस्तान को क्षमा कर दिया, अपराधियों को क्षमा कर दिया, किंतु मुङो अभी तक क्षमा नहीं प्रदान की। जबकि मैं नि:सहाय अवस्था में बागियों से मिला था। मैंने कोई हत्या नहीं की।

जब आपकी फौज के सैनिकों ने बगावत की तो मेरे सैनिक भी उनसे जा मिले। यदि मैं किसी खाई में छिप जाता तो मेरे ही सैनिक मेरी व मेरे परिवार की हत्या कर देते’।

इस पत्र के हवाले से लेखक ने नाना साहब को डरपोक और कायर दिखाया है,उन्हें 1857 के विद्रोह का नायक नहीं माना है। जबकि इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो अंग्रेजों से लोहा लेने में नाना साहब का भी अहम योगदान मिलता है।

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