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बच्चों का हक मारने में विकसित देश भी पीछे नहीं

सिर्फ गरीब व विकासशील देशों में ही बाल अधिकारों का हनन नहीं हो रहा बल्कि विकसित देशों में भी बच्चों को अधिकार नहीं मिल रहे। हैरानी की बात ये है कि पढ़े लिखे लोग ही बच्चों के साथ सबसे अधिक अत्याचार करते हैं।

यह विचार दक्षिण अफ्रीका की सुप्रीम कोर्ट ऑफ अपील के अध्यक्ष एल मपति ने व्यक्त किए। वह सिटी माण्टेसरी स्कूल की कानपुर रोड शाखा में विश्व के मुख्य न्यायाधीशों के दसवें अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्रसंघ भी बच्चों को पूरे अधिकार दिलाने में सक्षम नहीं है। यह सपना तभी साकार होगा जब विश्व संसद बनेगी।

विश्व के दो अरब बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए उन्होंने इसकी जोरदार हिमायत भी की। उन्होंने कहा कि चूँकि बच्चों वोटर नहीं होते इसलिए राजनीतिक दल भी उनकी आवाज नहीं बनते हैं। यह काम शिक्षण संस्थाओं को करना होगा, उसे लोगों को इसके लिए जागरूक बनाना होगा।

मिस्र के सर्वोच्च संवैधानिक कोर्ट के उप मुख्य न्यायाधीश डॉ. आदिल उमर शरीफ ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी के तेजी से हुए विस्तार और इंटरनेट के माध्यम से उन्हें परोसी जा रही अश्लीलता पर रोक लगाने के अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास होने चाहिए। बाल अपराध बढ़ने का भी यही कारण है। विश्व संसद और अन्तर्राष्ट्रीय कानून ही इसका एकमात्र उपाय है।

बर्कीनाफासो के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चिक डिमकिनसेडो औड्रागो ने कहा कि बच्चों के साथ हो रहे अन्याय व शोषण को रोकने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कानून बनाने होंगे। उनका शोषण करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा देने का प्रावधान होना चाहिए।

पढ़े- लिखे लोग ही सबसे अधिक बच्चों को परेशान करते हैं। मॉन्टेनेग्रो की मुख्य न्यायाधीश वेसीना मेडिनिका ने कहा कि उन्होंने सबसे अधिक कार्य बच्चों के बीच किया है। बाल अपराधी कोई ऐसे ही नहीं बनता, उसे लोग प्रताड़ित करते हैं और गलत संस्कारों के फेर में पड़कर वह ऐसे काम करने लगता है।

सीएमएस के संस्थापक जगदीश गांधी ने कहा कि उनके स्कूल के 37 हजार छात्रों की सिर्फ एक ही माँग है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के तहत विश्व शांति के प्रयास किए जाएँ। विश्व पार्लियामेण्ट का गठन हो और अन्तर्राष्ट्रीय कानून बनाकर उसे सभी देशों पर सामान रूप से लागू किया जाए।

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