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खुलने लगी है जीन चिकित्सा की किताब

भविष्य की उपचार पद्धति जीन चिकित्सा है। कल्पना कीजिए कि आप किसी डायग्नोस्टिक लैब में जाएं और अपना ब्लड सैंपल दें तथा कुछ ही मिनटों में वहां लगा सुपर कंप्यूटर आप की जीन कुंडली तैयार कर दे। वह बताएगा कि आपके शरीर में कितने जीन हैं, इनके कितने बेस पेयर्स हैं और वे किस क्रम में अवस्थित हैं। तब डाक्टर इस जीन कुंडली को देखकर आपकी बीमारी की ऐसी दवा देगा जो अचूक हो। यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति अपनी जीन कुंडली देखता है तो उसके लिए यह जानना संभव होगा कि उसकी जेनेटिक संरचना में कहां गड़बड़ी है और यह आगे जाकर क्या बीमारी पैदा कर सकती है।

ऐसे में प्रिवेंटिव मेडिसिन का विकल्प उपलब्ध होगा। अभी जीन की कूट भाषा को समझ रहे वैज्ञानिकों के लिए भविष्य में इनकी खराबियों को दुरुस्त करना या इन्हें ट्रांसप्लांट करना भी कोई मुश्किल काम नहीं होगा। बेशक इस दिशा में अभी भारत में शुरुआत भर हुई है, लेकिन अब तक दुनिया में जीन थेरैपी पर जितना भी काम हुआ है, भारत उसमें थोड़ा ही पीछे है। लेकिन भारत की आनुवांशिकीय विविधता ऐसी है जिसकी जेनेटिक मैपिंग के नतीजे पूरी दुनिया के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

सीएसआईआर के महानिदेशक समीर के ब्रह्मचारी कहते हैं कि भारत अपनी जनसंख्या की प्रकृति और अत्यधिक आनुवांशिक विविधता के चलते एशिया का लघु ब्रह्मांड है। देश की आबादी विश्व की जनसंख्या का छठा हिस्सा है, लेकिन यहां 4693 समुदायों तथा 325 कामकाजी भाषाओं तथा 25 लिपियों का प्रयोग होता है। इसकी वजह यह रही है कि भारत का समाज प्राचीन काल से ही अनेक मानव प्रवासों का साक्षी है तथा हर प्रवास के साथ एक नई आनुवांशिकता यहां पहुंची तथा यहां विद्यमान समुदायों में घुलमिल गई। फिर अफ्रीका से एशिया महाद्वीप में मानव के कदम पहले भारत में ही पड़े थे। इसलिए वैज्ञानिकों की कोशिश सभी समुदायों के लोगों की जेनेटिक सिक्वेसिंग करने की है। यानी उनके जीनों की कूट भाषा को पढ़कर उनकी क्रमबद्धता तैयार जाएगी।

कैसे होगी चिकित्सा?
इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के निदेशक डॉ. राजेश गोखले के अनुसार किसी व्यक्ति की जीन सीक्वेंसिग में सभी बेस पेयर्स की स्टडी की जाती है। बेस पेयर्स अरबों की संख्या में होते हैं। किसी व्यक्ति में कुछ बेस पेयर्स लुप्त होने या इनका क्रम सही न होने से भी बीमारी हो सकती है। इसलिए सीक्वेंसिंग से जाना जा सकता है कि किस व्यक्ति में कौन सा जीन या उसके बेस पेयर्स गायब हैं। प्रत्येक जीन या उसके बेस पेयर्स का शरीर की किसी न किसी क्रिया में योगदान है। कुछ जीन या बेस पेयर्स ऐसे भी होते हैं जिनकी भूमिका नकारात्मक भी होती है। इन्हें चिह्न्ति करने का कार्य विश्व भर में जारी है। भारत ने भी इस दिशा में ठोस पहल शुरू की है। भारत में अभी 55 आनुवांशिकीय समुदायों के लोगों की जीन सीक्वेंसिंग को पढ़ा जा रहा है। यह प्रक्रिया अभी बेहद महंगी है। एक व्यक्ति की जीन सीक्वेंसिग तैयार करने में करीब 15 लाख रुपये खर्च हुए हैं। इसमें सुपर कंप्यूटिंग सुविधा का इस्तेमाल होता है, लेकिन सबसे पहले जब विश्व के वैज्ञानिकों ने जीन मैपिंग परियोजना शुरू की थी तब उस पर 3.5 अरब डॉलर का खर्च आया था। कीमत कम हुई है और आगे तकनीकी के विकास से इसमें और कमी आएगी। इसलिए वह समय अब ज्यादा दूर नहीं है जब कुछ ही दिनों में कुछ हजार रुपये खर्च करके किसी व्यक्ति की जेनेटिक सीक्वेंसिग तैयार की जा सकेगी। बता दें कि अमेरिका में एक कंपनी ने आम लोगों के लिए दस हजार डॉलर में जीन सीक्वेंसिंग की सुविधा देने का ऐलान किया है। हालांकि यह भी अभी महंगा है।

जेनेटिक है वात, कफ और पित्त प्रवृत्ति
इस शोध में सीएसआईआर के वैज्ञानिकों ने जाना कि जीन संरचना के कारण ही लोगों की प्रवृत्ति वात, कफ और पित्त की होती है, जबकि अभी तक इसे विशुद्ध रूप से आयुर्वेद का एक सिद्धांत माना जाता रहा है तथा आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इस थ्योरी का कोई इस्तेमाल नहीं था। भारत में इंडो-यूरोपियन समुदाय के लोगों पर किए गए शोध के अनुसार वात प्रवृत्ति के लोगों में तंत्रिका संबंधी विकार, पित्त से रक्त संबंधी और कफ से दिल की बीमारियां जुड़ी हैं। वजह इन प्रवृत्तियों के लोगों में उपरोक्त बीमारियों के जीनों की सक्रियता रहती है। भारतीय वैज्ञानिकों ने इन लोगों के 90 हजार जीनों की जांच से यह तथ्य जाने। आयुर्वेद चिकित्सा में किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति की पहचान रोगी से सवाल करके जानी जाती है। इस शोध के नतीजों के आधार पर उपरोक्त प्रवृत्तियों के लोगों के उपचार के लिए खास दवाएं बनाना संभव होगा।

जेब्राफिश की जीन मैपिंग
मानव जीनोम को समझने के लिए गैर स्तनधारी श्रेणी में जेब्राफिश बेहतर मॉडल है। जेब्राफिश की जेनेटिक सीक्वेंसिंग के बाद इसके 450 जीनों के कार्य की पहचान की जा चुकी है। वैज्ञानिकों ने अल्जाइमर, किडनी, मस्कुलर डिस्ट्रोफी तथा बहरेपन के लिए जिम्मेदार जीनों की पहचान कर ली है। ये जीन क्रमश टीयूए, एमओ, डीएमडी तथा मायोसिन हैं। जेब्राफिश में 1.7 अरब डीएनए बेस पेयर्स हैं जो हालांकि मानव के बेस पेयर्स से तकरीबन आधे हैं, लेकिन वैज्ञानिक मनुष्य में पाई जाने वाली आनुवांशिक विविधताओं के मद्देनजर इसकी 100 संतानों की जेनेटिक सीक्वेंसिग कर रहे हैं।
भारतीय नागरिक का जीन कोड तोड़ा
वैज्ञानिकों ने एक 52 वर्षीय भारतीय व्यक्ति की जीन कुंडली तैयार कर ली है। यह व्यक्ति झारखंड का रहने वाला है तथा ऑस्ट्रो-एशियन आनुवांशिक बैकग्राउंड का है। सुपर कंप्यूटिंग सुविधा का इस्तेमाल करते हुए इसके 3.1 अरब बेस पेयर्स की स्टडी की गई है। इसके बाद अब वैज्ञानिकों देश में मौजूद अन्य जेनेटिक समुदायों के लोगों की जेनेटिक सीक्वेंसिग के कार्य में जुट गए हैं, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि दवा में इस शोध का फायदा तभी संभव होगा जबकि भारत में मौजूद हर समुदाय के कम से कम एक व्यक्ति का ऐसा ही जेनेटिक मैप हम तैयार कर लें। उसके बाद खास दवाएं बनेंगी यानी उत्तर भारतीय के लिए अलग, दक्षिण भारतीय के लिए अलग। लेकिन ऐसी दवाएं अचूक होंगी।
एशिया में मानव जीनोम मैपिंग
इस शोध में सीएसआईआर के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि एक लाख साल पहले अफ्रीका से इंसानों के कदम सबसे पहले भारत में पड़े थे। वहां मानव का इतिहास एक लाख 30 हजार साल पुराना है। करीब 67 हजार साल पहले ये लोग भारत से पूर्वी और दक्षिणी एशियाई देशों की तरफ गए। करीब 40 हजार साल पूर्व ये लोग मध्य एशिया की तरफ भी गए। शोध के अनुसार अफ्रीका से जो लोग निकले, उनमें भारत प्रवास के दौरान प्राकृतिक कारणों से जीन के टूटने (म्यूटेशन) की प्रक्रिया हुई। इसके फलस्वरूप कई नए आनुवांशिक समुदायों का उद्भव हुआ, लेकिन बुनियादी जेनेटिक संरचना के बीच समानता होने के कारण इस शोध का महत्व भविष्य में दवा परीक्षणों के लिए किया जा सकता है। मतलब यह हुआ कि यदि भारत में दवाओं के परीक्षण सफल होते हैं तो इन्हें पूरे एशिया के लोगों को बिना क्लिनिकल ट्रायल के दिया जा सकता है। अभी हर देश में वहां के जेनेटिक समुदायों पर दवाओं के परीक्षण किए जाते हैं तभी उनका उपयोग होता है।

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