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पाठशाला सिखाए पानी को पकड़ना

जहां दक्षिणी दिल्ली में भूजल स्तर करीब 8 फुट और गुड़गांव में तकरीबन 5 फुट सालाना की खतरनाक रफ्तार से गिर रहा है वहीं जामिया मिल्लिया इस्लामिया अपने पूरे परिक्षेत्र में बूंद-बूंद पानी को अच्छे से थामे है। जल प्रबंधन का यह पाठ अपने आप में अनूठा है।

विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर और यहां जल संरक्षण मुहिम के अगुआ गौहर महमूद कहते हैं, ‘ जामिया में भू-क्षेत्र के इस्तेमाल के मुताबिक रेन वाटर हार्वेस्टिंग मास्टर प्लान बनाया  गया है और यह पूरे देश में इस तरह का पहला उदाहरण है।’

दरअसल केंद्रीय भू-जल बोर्ड भी इमारतों की छत से जमा किए बरसाती पानी के प्रबंधन की सिफारिश करता है जबकि जामिया में इमारतें, मैदान, पक्की जमीन कहीं भी पानी बर्बाद नहीं होने दिया जाता।

बरसाती पानी को फिर से जमीन में पहुंचाने के लिए परिसर में छोटे-बड़े कुल सात रीचार्ज वेल हैं। इसके लिए 200 एकड़ में फैले पूरे विश्वविद्यालय परिसर को दस हिस्सों में बांटा गया है और जमीन की तासीर, बरसात की मात्र, पानी की जरूरत और पेड़-पौधों की संख्या के मुताबिक पानी का प्रबंधन किया गया है।

घनी आबादी से घिरे इस इस छोटे से विश्वविद्यालय के लिए पानी की दिक्कत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अबुल फजल एंक्लेव, बटला हाउस, जौहरी फार्म जैसे आसपास के इलाकों में निगम के पानी की आपूर्ति ही नहीं है। यमुना के किनारे बसा होने के बावजूद हाल यह था कि 600 फुट गहरे बोर के बावजूद ट्यूबवेल से 2000 लीटर की एक टंकी घंटे भर में भर नहीं पाती थी।

जल बोर्ड की सीमित आपूर्ती से जामिया की जरूरतें भी पूरी नहीं पड़तीं थीं। प्रो. महमूद बताते हैं कि 1995 से वर्ष 2000 तक यहां भी पानी की किल्लत थी लेकिन 2001 में तत्कालीन उपकुलपति शाहिद मेहदी की पहल पर दिक्कत सुलझाने के लिए योजना बनी और 2003 में इसे कार्यरूप दिया गया। अब पानी की किल्लत यहां नहीं है।

बरसाती पानी बचाने के अलावा इस्तेमालशुदा पानी को साफ करने के लिए डेंटल कॉलेज में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी बनाया गया है। बाग-बगीचों और फव्वारों में यही पानी इस्तेमाल करने की योजना है।  जामिया ने बड़े जतन से हाथ से बाहर जाती चीजों को बदला है। बाकी दुनिया के लिए बदलाव का यह सबक सीखना सबसे बड़ी जरूरत है।

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