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निगम को नहीं पता अपनी जमीन

शहर में धार्मिक स्थल के लिए जगह छोड़ने के लिए बनाई जाने वाली नीति को शुरुआत में ही झटका लग गया है। जगह अभाव के चलते कब्रिस्तान के बाद अब निगम धार्मिक स्थलों को जगह मुहैया करवाने में खुद को असहाय महसूस कर रहा है। जगह की खोज में जुटे अफसरों को मालूम ही नहीं है कि निगम की कहां कितनी जगह है। निगम सदन में प्रस्ताव आने के बाद निगम में आने वाले करीब 35 गांवों की पंचायती जमीन का रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है।

सेक्टरों को छोड़कर शहर की अधिकांश कॉलोनी बिना किसी प्लानिंग के विकसित हुई हैं। प्राइवेट लैंड पर बिल्डर या फिर प्रॉपर्टी डीलरों ने प्लॉट काट कर कॉलोनी बसा दी। बाद में हरियाणा सरकार ने जिनको नियमित कर दिया। निगम प्रशासन भी करीब 80 फीसदी रिहायशी क्षेत्र को इस श्रेणी में रखता है।

इन दिनों भी 77 अवैध कॉलोनियों को नियमिति करने की प्रक्रिया चल रही है। बहरहाल, निगम से कम लोग ही नक्शा पास करवाते हैं। प्लानिंग विभाग की तरफ से भी ऐसे क्षेत्रों को विकसित करने की कोई प्लानिंग नहीं बनाता है। नियमित होने के बाद वहां धार्मिक स्थलों की कमी खलती है। जरूरत को देखते हुए धार्मिक स्थल के लिए जगह की मांग उठने लगी है।

30 नवंबर को निगम सदन की बैठक में पार्षद धनेश अदलक्खा ने धार्मिक स्थल के लिए जगह छोड़ने का प्रस्ताव रखा था। अदलक्खा ने सेक्टर-11 डीएलएफ में जगह छोड़ने की मांग उठाई। बाकी पार्षदों ने इस पर विचार करने की बात कही। बाद में सभी पार्षद धार्मिक स्थल छोड़ने के लिए नीति बनाने पर राजी हो गए। इसके बाद मंजूरी को प्रस्ताव दोबारा सदन में लाने पर एकमत हुए।

सदन में प्रस्ताव आने के बाद निगम ने शहर में अपनी जमीन तलाशने का अभियान शुरू किया। निगम का रास्जव विभाग इसमें जुटा है। निगम क्षेत्र के करीब 35 गांवों की जमीन खंगाली जा रही है। वहां पंचायत की जमीन निगम की संपत्ति है। करीब छह हजार एकड़ जमीन निगम को मिली है।

अकेले गांव अनंगपुर में ही करीब चार हजार एकड़ जमीन है। बड़खल, अनखीर, भांखरी, मेवला महाराजपुर, लक्कड़पुर आदि गांवों में पंचायत जमीन है। अरावली में इसका ज्यादा हिस्सा है।

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