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बेचैन उम्मीदों के सूरज और आशंकाओं के कुहासे

हुक्मरां जब दबाव में आते हैं तो उनकी दृष्टि बेहद सीमित और संकुचित हो जाती है। उन्हें दूर का दिखना बंद हो जाता है और कभी-कभी वे ऐसे फैसले लेते हैं, जो आगे चलकर विनाशकारी साबित होते हैं। क्या तेलंगाना राज्य के गठन का वायदा भी ऐसा ही साबित होगा? आशंकाओं के बगुले फ़िजाओं में तैरते दीख रहे हैं।
चंद्रशेखर राव का अनशन जब 11वां दिन लांघ रहा था तो तनाव भी चरम पर पहुंच रहा था। अनजानी आंशकाओं को समझते हुए हैदराबाद के स्कूल संचालकों ने अपने दरवाजे बंद कर दिए थे, ताकि किसी आशंकित अनहोनी का असर नन्हे-मुन्नों पर न पड़े। पृथक तेलंगाना आंदोलन के हिंसक दिन भले ही चार दशक पुराने हो गए हों, पर फिर भी जागरूक लोगों के जेहन में उनकी यादों की तपिश से सुलग उठे थे। पता नहीं कब के विस्मृतियों में खो चुके पोट्टि श्रीरामुलू की शहादत का जिन्न नई दिल्ली से नागपट्टम की सड़कों पर विचरने लगा था। कौन थे ये पोट्टि श्रीरामुलू? लोग उन्हें भूल गए हैं, पर ये एक ऐसे समाजसेवी थे जिन्होंने अपना जीवन आंध्र प्रदेश के लिए गंवा दिया था। वे मद्रास से आंध्र को अलग करने की मांग को लेकर जब अनशन पर बैठे, तो भले ही मन ही मन कितने दृढ़ रहे हों, सरकार उन्हें लेकर गंभीर नहीं थी। भूख और प्यास से उपजी मौत से श्रीरामुलू 58 दिन तक जूझते रहे। अंतत: उनकी जिंदगी हार गई। इसके बाद तो ऐसा हंगामा बरपा हुआ कि जवाहरलाल नेहरू को जिद छोड़नी पड़ी। पृथक आंध्र प्रदेश पोट्टि की मौत के साथ ही जन्मने लगा था।
नए प्रदेश के साथ कुछ विकृतियां जन्मजात तौर पर जुड़ी हुई थीं। तेलंगाना के लोगों को लगता था कि यदि उन्हें अलग प्रदेश नहीं मिला तो कम से कम नए सूबे में उनकी न्यायोचित मांगों को जरूर जगह मिलेगी। पर शुरुआती तीन साल में ही उनका मोहभंग हो गया। आंकड़ों को जीने वाले लोग कहने लगे कि 40 फीसदी से ज्यादा जमीन तो इस प्रदेश में हमारी है। जल, जंगल और जमीन का आनुपातिक सुफल हमें नहीं मिलता और इसीलिए हम बदहाल होते जा रहे हैं। बहस-मुबाहसे का असर यह हुआ कि लोग सड़कों पर उतरने लगे। केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों को भी उन पर काबू पाने में खासी दिक्कत पेश आने लगी थी। कई बार गोलियां चलीं। लाठी और आंसू गैस तो जिंदगी का हिस्सा बन गई थी। लेकिन वे आजादी के तुरंत बाद के दिन थे और थोड़े-मोड़े संदेहों के बावजूद लोग एक स्वप्नजीवी प्रधानमंत्री की बातों पर यकीन करते थे। हिंसा का लावा कुछ समय बाद बुझ गया, पर जमीन के अंदर आग धधकती रही। चंद्रशेखर राव इसी अग्नि के गर्भ से जन्मे हैं।
आपको याद होगा। मनमोहन सिंह की सरकार में वे मंत्रीपद से नवाजे गए थे और लोगों ने मान लिया था कि तेलंगाना के सपने एक बार फिर दुर्घटना के शिकार बन गए। पर राव अच्छी तरह जानते हैं कि जमीन के नीचे की आग जिससे वे जन्मे हैं, उनकी सियासी मौत का भी सबब बन सकती है। इसीलिए वे सत्ता का सिंहासन छोड़कर एक बार फिर संघर्ष के बियाबान में पूरी ताकत से उतरते नजर आए। पिछले विधानसभा चुनावों में जब कांग्रेस ने दोबारा सत्ता हासिल की, तो उनकी सियासी बुद्धि ने उन्हें एक बार फिर सतर्क किया कि जीना है तो मरने के लिए तैयार रहना होगा। इसीलिए उन्होंने श्रीरामुलू का रास्ता चुना और फिलहाल जीतते नजर आ रहे हैं। केन्द्र ने राज्य के पुनर्गठन के लिए समिति बना दी है और मुस्कुराते हुए राव अस्पताल से मुक्त होकर घर के लिए रवाना हो गए हैं पर पूरे देश में फैले छोटे राज्यों के हमजोलियों को जैसे फिर से नई रहगुजर हासिल हो गई है।

गोरखालैंड की मांग को लेकर वहां के प्रमुख नेता अनशन पर जा बैठे हैं। उत्तर प्रदेश में पूर्वाचल और हरित प्रदेश की मांग फिर सिर उठाने लगी है और यही वह बिंदु है जहां कई सवाल फन फैलाने लगते हैं। अगर आंध्र से तेलंगाना अलग होगा, तो फिर रायलसीमा क्यों नही? चार तटीय जनपदों के लोग वहां पहले से ही अलग पहचान के लिए छटपटा रहे हैं। यही नहीं। जम्मू-कश्मीर में लद्दाख के लोग भी ऐसी ही मांग करते रहे हैं। फिर महाराष्ट्र में विदर्भ, गुजरात में सौराष्ट्र, असम में बोडोलैंड, केरल में त्रवणकोर और कर्नाटक में कुर्ग ने क्या गुनाह किया है? मैं छोटे राज्यों के खिलाफ नहीं हूं, पर फिर भी अगर हम बांटने पर आएंगे तो कहां तक बांटेंगे? यह भी याद रखना होगा कि बंटवारों की मांग वाले राज्यों में कुछ बेहद संवदेनशील हैं। असम में बंदूकें गरजती रही हैं और कश्मीर कई वजहों से आज भी धधक रहा है। ऐसे में कितने तिल ताड़ बन उठेंगे, कहा नहीं जा सकता।
फिर छोटे राज्यों के प्रयोग पूरी तरह सफल हो गए हों, ऐसा भी नहीं है। हरियाणा या हिमाचल जैसी किस्मत उत्तर-पूर्व के राज्यों ने नहीं पाई है। इसी तरह हाल ही में बने झारखंड और छत्तीसगढ़ के हालात भी निराशाजनक रहे हैं। झारखंड जब बिहार का हिस्सा हुआ करता था तो प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 9955 रु. सालाना था। आज भी हालात में कोई खास सुधार नहीं आया है। जमीन के अंदर छुपी संपदा के मामले में यह प्रदेश देश के सबसे भाग्यशाली इलाकों में माना जाता है। पर उसका फायदा इस जमीन के बेटे नहीं उठा पा रहे हैं। पिछले नौ साल में छ: सरकारें बदली हैं। इनके मुख्यमंत्रियों में शिबू सोरेन और मधु कोड़ा भी हैं।

गुरु जी के नाम से मशहूर सोरेन पर सत्ता की शक्ति के दुरुपयोग के आरोप लगे पर मधु कोड़ा ने तो कमाल ही कर दिया। अगर राजस्व जांच इकाइयों के दावों को सही मानें तो उन्होंने हजारों करोड़ रुपए कमाए। सत्तानायकों की इस बदनीयती का खामियाजा पूरे प्रदेश को भुगतना पड़ रहा है। नक्सलवादी अपने पांव तेजी से पसारते जा रहे हैं और विकास की आस पीछे छूटती नजर आ रही है। इस मामले में छत्तीसगढ़ थोड़ा ज्यादा नसीब वाला है। वहां राजनीतिक अस्थिरता नहीं है। रमन सिंह को दोबारा जनादेश मिला और वे मुख्यमंत्री हैं। उनकी गिनती साफ सुथरे सत्ताधीशों में होती है। पर फिर भी आम आदमी की बदहाली पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। 2001 में प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 12400 रु. सालाना था।
इसमें सिर्फ दो फीसदी वार्षिक की बढ़ोतरी हो रही है। उतनी ही जितनी पहले होती थी। यहां 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग किसी तरह अपना पेट पालते हैं। नक्सलवाद यहां भी जोर पकड़ता जा रहा है। यह तस्वीर सबसे ताजातरीन प्रदेशों की है। इसीलिए आंख बंद करके यह मान लेना कि छोटे राज्य विकास का पर्याय हैं, ठीक नहीं होगा। यही वजह है कि जब चंद्रशेखर राव अनशन पर बैठते हैं और जब वह उपवास तोड़ते हैं तो दो अलग तरह की आशंकाएं घर कर जाती हैं। अफसोस! इस घटाटोप में आगे बढ़ने की आकांक्षा की कोई उजली किरण नजर नहीं आती। बहुत कुछ गंवाने के बाद यदि कुछ मिल भी जाता है, तो वह हताशा उपजाती है। आंध्र प्रदेश में कहीं यही तो नहीं होने जा रहा?
Shashi.shekhar@hindustantimes.com

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