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साहित्य का ‘बाजार युग’

साहित्य अकादमी ने प्रख्यात बहुराष्ट्रीय निगम ब्रांड सैमसंग से बात करके साहित्य बाजार-युग का आरंभ कर दिया है। वह सैमसंग के साथ मिलकर साहित्य सम्मान करना चाहती हैं, सम्मान के साथ रवींद्रनाथ टैगोर का नाम भी जुड़ेगा। इस मिक्स्ड सम्मान को आता देख कुछेक ‘प्रगति-श्लथ’, ‘जनवादहत’ साहित्यिक जन परेशान हो उठे हैं, उनकी चिंता है कि सैमसंग साहित्य अकादमी की मिलीभगत से साहित्य की साम्राज्यवाद विरोधी ताकत कम हो जाएगी। हिन्दी साहित्यकार की प्रिय विरोधी मुद्रा तिरोहित हो जाएगी। कोई क्या लिखेगा अगर एक कविता में सौ बार विरोध-विरोध-विरोध न लिखेगा तो? कोई क्या कलम चलाएगा अगर बाजार के विरोध में अपनी ‘क्रांतिकारी’ लेखनी से धिक्कारेगा नहीं तो? क्रांति के रास्ते में अगर अब कोई या और आखिरी रोड़ा है तो अकादमी और सैमसंग हैं।

चिर-विरोध, विक्षुब्ध सतत, नित क्रांति-क्रांति में चतुर चलित साहित्यिक जन अब तक कई तरह की क्रांतियां कर चुके हैं और आगे भी इसी गति से करते रहना चाहते हैं। सैमसंग ने आकर बाधा डाल दी है। साहित्य से सैमसंग का क्या मतलब? वो मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर, सीडी प्लेयर, एसी, फ्रिज, कुकिंग रेंज बनाए। मोबाइल से चिपके साहित्यकार को टीवी दिखाए, फ्रिज का ठंडा मतलब कोका कोला पिलाए, एसी कूल-कूल करे लेकिन वह साहित्य के पवित्र क्रांतिकारी मंदिर में क्यों आ रहा है?

हे हिंदी के नवीन बिंदास पाठक-पाठिका! हिंदी का साहित्यकार साहित्य से ज्यादा साहित्य की मुद्रा का फोटोबाज है, सोवियत गिर गया, चीन समाजवाद से फिर गया और पूंजीवाद के संग कबड्डी खेलने लगा, लेकिन हिंदी वाला अभी तक क्रांति के बंबू को हाथ में थामे हैं जबकि उसका तंबू उड़ चुका है। अब उस बंबू को छीनने सैमसंग आ रहा है।

अंकल सैम से लेकर, अपने इतिहास में हुए शुंग वंश का शुंग लेकर सैमसंग या उसके जैसे दूसरे ब्रांड एक मोबाइल बनकर साहित्यकार के कान से दिल-दिमाग तक दुनिया से बातचीत कराता है। मनमाफिक रिंगटोन सुनाता है। टचस्क्रीन मोबाइल सेटों के जरिए इंटरनेट, कैमरा, वीडियो, रेडियो और तमाम तरह की संचार-संवाद सुविधाएं देता रहता है। लेकिन अपना हिंदी वाला अपनी दुर्वासा-ब्रांड मुद्रा के संग ही पोज देता है। कैसी अद्भुत वीर मुद्रा है कि कान पर मोबाइल लगा है, दिल में दिमाग में सूचना दे रहा है। रस, छंद और कई अलंकार भी दे रहा है। उसकी वजह से क्रांति नहीं रुकती, क्रांति रुक रही है, संघर्ष कमजोर हो रहा है तो उसके नाम से उसके नाम के साहित्य के साथ जरा-सा जुड़ जाने मात्र से हो रहा है।

बाजार हिंदी में खतरनाक मिथ की तरह देखा जाता है। आजादी के बाद से दीक्षित पब्लिक सेक्टरी साहित्यकार अब तक फ्री लंच और डिनर दारू के आदी रहे हैं। ‘अजगर करे न चाकरी’ वाली लाइन रही है। सबकी ‘दाता’ एक सरकार रही है। अब नया पूंजीवाद है जो साफ कहता है- नो फ्री लंच, काम दे, दाम ले। सरस्वती के इन वरद-पुत्रों का, हिंदी बुद्धिजीवियों का यह कैसा दुर्भाग्य कि जिंदगी भर वीणा वादिनी से फ्री वर मांगते रहे और जमाना आ गया ‘नो फ्री लंच’ का। किसी की डिमांड पर आदेश पर कोई काम साहित्य और इस हिंदी साहित्यकार के साथ हद दर्जे की बदसलूकी है। साहित्य किसी सरकारी दफ्तर की तरह ही खुलता और बंद होता है।

बाजार को समझे बिना बाजार के विरोध में अपनी कोमलकांत पदावलियों को लगाते साहित्यिक ये जानते हैं कि यह भी उनकी एक मुद्रा भर है। हिंदी में ‘फ्रेंडली’ एंट्री करने को उत्सुकायमान किसी दूतावास में किसी से सेटिंग कर, किसी किताब का अनुवाद कर, डालर मार, यहां वहां पीआर करा विदेश यात्रा झटक वहां अपनी किताब का पुल बना यहां उनकी बना। यह निजी-हित-सेवा है इसमें धंधा होता चोखा है लेकिन वह दिखता नहीं। अगर माल लेते दिख भी जाएं तो भी चलेगा लेकिन किसी ब्रांड के साथ न दिख जाएं। हाय बाजार से लड़ते-लड़ते वे बाजार की जेब काटते दिख ही गए।

बहरहाल बंदा प्रसन्न है कि हिंदी के पूंजीरहित बाजार में कुछ पूंजी निवेश हो रहा है। अगर पूंजी बढ़े तो यह क्रांतिकारी पाखंड भी खत्म हो। इसके लिए सब ब्रांडों को हिंदी साहित्य में आकर हिंदी साहित्यकारों के नाम के आगे पीछे लगकर एक लाख दस लाख, एक करोड़ तक के सम्मान घोषित कर देने चाहिए। उन्हें मोबाइल, टीवी, फ्रिज देना चाहिए। मकान भी दिया जा सकता है। इनाम में मर्सिडीज वाले हाथ बंटा सकते हैं। टू डेज थ्री नाइट की विदेश फ्री ट्रिप वगैरह भी। हमारा प्रस्ताव है कि दो चार ‘प्रेमचंद पेप्सी’ सम्मान हो, दस पांच ‘नामवर- नोकिया’ सम्मान हों, बीस ‘एअरटेल-अशोक’ सम्मान, तीस ‘द्विवेदी-डालडा’ सम्मान कुछ ‘हरिश्चंद हीरो होंडा’ सम्मान। ये आइडिया देने के लिए हैं, आगे के इनाम आप सोचें।

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