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शहरियों को साँस लेना दुश्वार

पर्यावरणविदों की नजर में लखनऊ बगैर प्लॉन के बस रहा है! इससे ट्रैफिक सिस्टम फेल है। नए बसने वाले इलाकों में जरूरत के लिहाज से सड॥कों व फ्लाईओवर के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। बहुमंजिला व्यावसायिक भवनों में पार्किंग की सुविधा नहीं है। वाहनों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही है। हरियाली खत्म हो रही है। सड॥कों के हरे-भरे किनारे नहीं दिख रहे। वाहनों से निकलने वाले घातक तत्व साँस के जरिए फेफड़े में पहुँच रहे हैं। 2016 में 25 प्रतिशत लखनऊवासी साँस व फेफड़े के रोगी हो जाएँगे। बड़ा पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो रहा है। मुख्य सचिव अतुल कुमार गुप्ता की मौजूदगी में यह तल्ख हकीकत ‘क्लब ऑफ लखनऊ’ की बैठक में उभरी।ड्ढr पिकअप भवन सभागार में हुई बैठक में लखनऊ के ‘ससटेनेबल डेवलपमेंट’ विषय पर साफ पानी, शुद्ध हवा व शांत क्षेत्र को महफूा करने पर चर्चा हुई। सुप्रीम कोर्ट में इनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एंड कन्जरवेटरी अथॉरिटी (ईपीसीए) के प्रमुख डॉ.भूरे लाल ने कहा कि शहर में पीने के पानी की गुणवत्ता बंग्लादेश से भी गई गुजरी है। लखनऊ के 50 प्रतिशत तालाब-पोखर पट गए। ट्रांसपोर्ट सिस्टम फेल है। पाँच किमी चलने में घंटा भर लग जाता है। वातावरण में धूल-कण यानी एसपीएम 400 माइक्रोग्रामघनमीटर के पार चला गया। सल्फर डाईआक्साइड,नाइट्रोन के डाईआक्साइड व एसपीएम के स्तर में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। सड॥कों का 75 प्रतिशत हिस्सा कारें घेर रही हैं,ाबकि उसमें सिर्फ 20 प्रतिशत लोग ही यात्रा कर पाते हैं। बाकी सड॥क दोपहिया वाहनों से भर जाती है। शहर को बचाने की नियोजित कोशिश न हुई तो हालात खराब हो जाएँगे। लखनऊ क्लब के संस्थापक चेयरमैन टीएसआर सुब्रहमण्यम ने शहरीकरण के लिए महात्मा गांधी के विकास मॉडल को अपनाने की जरूरत बताई। संचालन आरएन भार्गव ने किया।

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