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पढ़ने में रुचि नहीं दिखा रहे नेताजी

राज्य की जनता द्वारा चुने गए असाक्षर जनप्रतिनिधि भी पढ़ने में अपनी रुचि नहीं दिखा रहे। राज्य सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग को यह अहसास इन दिनों गहराई से साल रहा है। उसे चिंता है कि जब नेताजी लोग भी अक्षरों से दोस्ती नहीं करेंगे तो आखिर अशिक्षा के लिए देशभर में मशहूर बिहार के दिन कैसे फिरेंगे?

आलम यह है कि जिलों में त्रिस्तरीय पंचायत राज्य के अंतर्गत निर्वाचित असाक्षर जन प्रतिनिधियों के लिए शिविर तक नहीं लगाए जा सके। ऐसे 18 जिले हैं जहां असाक्षर जनप्रतिनिधियों के लिए साक्षरता कार्यक्रम डेढ़ साल में शुरू भी नहीं हो सके और इस मद की करीब 31 लाख राशि यूं ही बेकार पड़ी है।  

एचआरडी के जनशिक्षा से मिली जानकारी के मुताबिक त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था लागू होने के बाद बिहार सरकार ने महसूस किया कि नीचे के स्तर पर चुने गए 20 से 25 फीसदी जनप्रतिनिधि असाक्षर हैं। इनके लिए अक्षरबोध जरूरी है ताकि फाइल पर साइन करने के पहले वह इसके मजमून और राशि की जानकारी पा सकें।

वर्ष 2008-09 में राज्य सरकार ने पहले फेज में 3800 जनप्रतिनिधियों को साक्षर बनाने का लक्ष्य तय किया। प्रति जिला एक लाख 24 हजार की दर से राज्यभर में 4 लाख 71 हजार रुपए दिए गए। डेढ़ साल बीत जाने पर भी महज 16 लाख 32 हजार 650 रुपए ही खर्च हुए हैं।

3800 की जगह महज 1748 जनप्रतिनिधि ही साक्षरता शिविर में आए हैं। इनमें 329 पुरुष और 1081 महिलाएं थीं। सरकार के मुताबिक पटना, बक्सर, गया, अरवल, औरंगाबाद, शिवहर, वैशाली, पूर्वी व पश्चिमी चम्पारण, सारण, गोपालगंज, दरभंगा, समस्तीपुर, अररिया, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, शेखपुरा, लखीसराय, जमुई और भागलपुर ऐसे 18 जिले हैं जहां किसी भी असाक्षर जनप्रतिनिधि को अक्षर ज्ञान नहीं दिया गया और न ही योजना का एक धेला खर्च हुआ है। जबकि ऐसा नहीं है कि इन जिलों में सभी प्रतिनिधि साक्षर हैं। सरकार के मुताबिक पहले चरण में 2052 नेताजी लोगों को साक्षर बनाना शेष रह गया है।

लक्ष्य पूरा करने वाले जिलों में भोजपुर, भभुआ, मुझफ्फरपुर, सीतामढ़ी, सीवान, समसत्ीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, पूर्णिया, अररिया, कटिहार, किशनगंज,मुंगेर, जमुई, भागलपुर और बांका ही ऐसे जिले हैं जहां जनप्रतिनिधियों के लिए दो साक्षरता शिविरें हो चुकी हैं।

नालंदा, रोहतास, गया, जहानाबाद, नवादा, शिवहर, वैशाली और मधुबनी में एक शिविर हो चुकी है। दरभंगा, बक्सर, पू. व प. चम्पारण, सहरसा, सुपौल और मधेपुरा में तो शिविर हुए दो-दो पर एक भी असाक्षर जनप्रतिनिधि ने इसमें हिस्सा ही नहीं लिया। योजना का पूरा पैसा यहां पड़ा है।

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