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उत्तराखंड का लाल था प्रथम शोध छात्र

उत्तराखंड का लाल था प्रथम शोध छात्र

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के पाली ग्राम में 13 दिसंबर 1901 को जन्मे डॉ. पीताम्बर दत्त बडथ्वाल भारत के प्रथम शोध छात्र हैं जिन्हें 1933 के दीक्षांत समारोह में डी.लिट (हिन्दी) से नवाजा गया।

उनके शोधकार्य ‘ हिन्दी काव्य में निगरुणवाद’ (द निगरुण स्कूल ऑफ हिन्दी पोयट्री) अंग्रेजी शोध पर आधारित थी जो उन्होंने श्री श्यामप्रसाद जी के निर्देशन में किया था।

उनके शोध और लेख उनके गंभीर अध्ययन और उनकी दूरदृष्टि के भी  परिचायक हैं। उन्होंने कहा था ‘भाषा फलती-फूलती तो है साहित्य में, अंकुरित होती है बोलचाल में और साधारण बोलचाल पर बोली मंज-सुधरकर साहित्यिक भाषा बन जाती है।’

वे दार्शनिक व्यक्तित्व के धनी, शोधकर्ता, निबंधकार व समीक्षक थे। उनके निबंध, शोधकार्य को आज भी शोध विद्यार्थी प्रयोग करते हैं। डॉ. बडथ्वाल के शोध कार्यो को साहित्यकारों ने अपने लेखों में और अपने कार्यो में शामिल किया और उनके कहे को प्रमाण माना।

यह अवश्य ही चिंताजनक है कि सरकार और साहित्यकारों ने उनको वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। प्रयाग विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. रानाडे ने भी डॉ. बडथ्वाल के शोध के बारे में कहा कि रहस्यवाद की दार्शनिक व्याख्या के लिए भी एक महत्वपूर्ण शोध है। उन्होंने 24 जुलाई 1944 अंतिम सांस ली।

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