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दो टूक (12 दिसंबर, 2009)

सेंध लगाकर माल उड़ाना और आग लगाकर रफूचक्कर हो जाना। दिल्ली पुलिस को छकाते हुए कुछ चोर लगातार ऐसी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। हादसों का शिकार किस हैसियत के कौन-कौन लोग बने, या कितनी मोटी रकम उड़ाई गई, सवाल यह नहीं है।

सवाल यह भी नहीं कि वारदात के बाद आग लगाकर चोर सुराग मिटाना चाहते हैं या यह महज उनका अलग तरीका है। हैरत की बात यह है कि ताजा घटना उस पुलिसिया दावे के बाद सामने आई जिसके मुताबिक इन घटनाओं में शामिल गिरोह की धर-पकड़ हो चुकी थी। सेंधमारों का शिकार बने घरों से उठते धुएं में सिर्फ लुटे-पिटे लोगों का दर्द ही नहीं है कालिख भी है जो पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा रही है।

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