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तेलंगाना नहीं, भारत की चिंता करें

तेलगांना राष्ट्र समिति के नेता क़े चंद्रशेखर राव का अनशन जिस हड़बड़ी में तुड़वाया गया है और जिस ताबड़तोड़ तरीके से तेलगांना प्रदेश के निर्माण की प्रक्रिया घोषित की गई है, उसी में दूरंदेशी नहीं दिखती। हम तभी हाथ-पैर मारना शुरू करते हैं, जब पानी सिर से ऊपर बहने लगता है।

इसमें शक नहीं कि यदि राव को कुछ हो जाता तो इस बार 1952 के श्रीरामुलु-कांड से भी भयंकर चक्रवात आंध्र को घेर लेता। इस दृष्टि से गृहमंत्री की घोषणा प्रासंगिक लगती है लेकिन कांग्रेस के हाईकमान ने यह भी नहीं सोचा कि उसके अपने विधायक और सांसद सामूहिक इस्तीफा दे सकते हैं और विधानसभा में तेलंगाना-प्रस्ताव पारित करना असंभव हो सकता है। अब स्थिति और भी बदतर है। आंध्र के लगभग सभी प्रमुख दलों के विधायक इस्तीफा दे रहे हैं। कोई तेलंगाना के पक्ष में दे रहा है तो कोई विपक्ष में! अब केंद्र जिधर भी झुकेगा, उधर ही मुसीबत होगी। अब विवेक और तर्क की जगह भावुकता और ताकत की तूती बोलेगी।

यह लहर आंध्र तक सीमित नहीं रहेगी। पूरे भारत में दर्जन भर अलग राज्यों के झंडे उचकने लगेंगे। कांग्रेस अगर अपने 2004 के वादे के मुताबिक तेलंगाना राज्य का निर्माण करवा देती तो शेष प्रांतों में अलगाव की आग इतनी तेजी से नहीं भड़कती। आंध्र की रेड्डी-सरकार ने अपनी लोकप्रियता का लाभ उठाकर तेलंगाना राष्ट्र समिति को राजनीतिक हाशिए पर सरका दिया लेकिन चंद्रशेखर राव के अनशन ने उन्हें आज ‘महानायक’ की छवि प्रदान कर दी है। तेलंगाना बने या न बने, अब तेलंगाना-क्षेत्र में राव की राष्ट्र समिति को हराना किसी भी दल के लिए असंभव हो जाएगा। यदि भाजपा-गठबंधन की तरह कांग्रेस-गठबंधन पिछले पांच वर्षों में तेलंगाना बना देता तो आनेवाले वर्षों में कांग्रेस का गढ़ अभेद्य बन जाता।

आंध्र की वर्तमान ऊहापोह ने चिदंबरम की घोषणा को अधर में लटका दिया है। यदि कांग्रेस का नेतृत्व अपने विधायकों और सांसदों के साथ जोर-जबर्दस्ती करेगा तो कांग्रेस के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। जगमोहन रेड्डी के समर्थक इस नई आग में घी डालना शुरू कर दें तो आश्चर्य नहीं होगा। ऐसी स्थिति में तेलंगाना निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की बजाय यह कहीं बेहतर होगा कि केंद्र सरकार देश में उठ रही अलग राज्यों की सभी मांगों पर पुनर्विचार करने के लिए एक आयोग की घोषणा करे।

वह आयोग निश्चित अवधि में अपनी रपट पेश करे। सारे दावों की परीक्षा के लिए मापदंड तय करे। कोई भी निर्णय अनुचित दबाव या ब्लेकमेल या क्षुद्र स्वाथरें से प्रेरित न हो। यदि किसी नए राज्य का निर्माण देश की सुरक्षा, एकता या समग्र विकास के विरुद्ध हो तो उसके दावे को सख्ती से रद्द किया जाए। तेलंगाना को स्वीकार करने में गलत कुछ नहीं है लेकिन उसे आज स्वीकार करना ऐसा लगता है मानो केंद्र सरकार घुटने टेक रही है। यह छवि सरकार ही नहीं, देश के लिए भी अनंत प्रेत-बाधा बन सकती है। इसके आधार पर तर्क यह बनेगा कि जो नेता जितना डरा सके, वह उतना ही निचोड़ ले जाएगा।
 
नए राज्यों के निर्माण से घबराने की जरूरत नहीं है। याद करें कि 1956 में भाषा के आधार पर जब नए राज्य बने तो उनके विरुद्ध क्या-क्या तर्क दिए गए थे। जो नए राज्य बने, क्या उनमें एक भी विसर्जित हुआ? क्या एक भी राज्य ऐसा निकला, जो अपने पांवों पर खड़ा न हो सका? क्या एक भी सीमांत राज्य किसी विदेषी शक्ति का मोहरा बना? क्या किसी भी राज्य ने भारत से अलग होने में सफलता पाई? राज्यों के पुनर्गठन से भारत मजबूत हुआ या कमजोर हुआ? बड़े पुनर्गठन के बाद भी जो राज्य बने, उनसे हमने क्या सीखा? क्या छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड आदि विफल राज्य कहे जा सकते हैं? नए राज्यों में यदि कहीं भ्रष्टाचार या नक्सलवाद है तो ये समस्याएं तो कई पुराने राज्यों में भी हैं।
 
पता नहीं, हमारे कुछ नेताओं में बड़े राज्यों का मोह क्यों है? एक प्रांत के कुछ हिस्सों में बादशाहत हो और कुछ में फाकामस्ती, इससे किसी नेता को कोई फर्क नहीं पड़ता था। प्रांतीय प्रशासन में क्षेत्रीय संतुलन कितना ही कच्चा हो, लखनऊ और दिल्ली में अपनी कुर्सी पक्की होनी चाहिए, यह सिद्घांत आखिर कब तक चलेगा? हैदराबाद की हुकूमत पर लार टपकानेवाले नेता यह क्यों भूल जाते हैं कि तेलंगाना के लाखों नंगे-भूखे और अशिक्षित लोग भी भारत के ही नागरिक हैं? वे भी हमारे भाई-बहन हैं? उनको न्याय कब मिलेगा? इसी तरह अगर गोरखालैंड, विदर्भ, कुर्ग, बुंदेलखंड, सौराष्ट्र, पूर्वांचल, मिथिलांचल आदि के लोग अपनी आवाज उठाते हैं तो इसमें गलत क्या है?
 
यदि किसी मापदंड के आधार पर 15-20 छोटे और नए राज्य बन जाएं तो हमारा लोकतंत्र ज्यादा मजबूत होगा। आज भी हमारे कई प्रदेश इतने बड़े हैं कि दुनिया के 80-90 राष्ट्र उनसे छोटे हैं। देशों से भी बड़े प्रदेशों की सरकारों को जनता के निकट लाने का आखिर तरीका क्या है? यदि मतदाताओं की संख्या कम होगी तो विधायकों और सांसदों का प्रतिनिधित्व भी अधिक घनिष्ट होगा। राज्यों की संख्या बढ़ने पर शक्ति का विकेंद्रीकरण भी बढ़ेगा। यह दुधारी प्रक्रिया है। केंद्र भी मजबूत होगा। छोटे राज्यों के नेता अपने राज्यों के आर्थिक विकास पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे। नए संवैधानिक संशोधन के कारण मंत्रिमंडल भी छोटे ही होंगे। फिजूलखर्ची का तर्क बोदा है, क्योंकि छोटे राज्यों में जनता की नज़र नेताओं पर ज्यादा पैनी हो जाती है। राज्यों के पुनर्गठन का आधार केवल भाषा नहीं हो सकती। यदि ऐसा होता तो सभी हिंदी भाषी प्रदेषों को एक राज्य में रख दिया जाता। जाति, मज़हब और वंश भी आधार नहीं हो सकते।

इन आधारों ने श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और इराक़ जैसे राष्ट्रों को संकट में डाल रखा है। जरूरी यह है कि जो भी राज्य बने, वह सुप्रशासित हो, एकात्म हो और उसकी अपनी पहचान हो। अमेरिका में 50 राज्य हैं। उसमें भी 13 से 50 हुए तो क्या वह कमजोर हो गया? उसकी जनसंख्या भारत से एक-तिहाई है यानी भारत में 100 राज्य बन जाएं तो भी क्या खतरा है? सिर्फ एक अस्मितावाले और बड़े राज्यों से तो अलगाव का खतरा हो सकता है लेकिन छोटे राज्य तो प्रशासन, आर्थिक प्रगति, समुचित प्रतिनिधित्व और केंद्र की मजबूती के लिए वरदान ही साबित होते हैं।

लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं

dr.vaidik@gmail.com

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