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किसके लिए बने हैं अपने कानून

हाल ही में मधु कोडा की गिरफ्तारी हुई। उसके बाद जो हुआ, वह इस देश में अक्सर होता है। यहां किसी जुर्म में अमीर या ताकतवर को पकड़ा जाता है। मीडिया में हो-हल्ला होता है कि कोई भी देश के कानून से बड़ा नहीं है। अब जिनको पकड़ा जाता है, वे अपने को बेगुनाह बताते हैं। किसी खास शख्स पर अपने खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाते हैं। और फिर धमकी भी दे देते हैं। यानी अगर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई, तो उसके गंभीर नतीजे होंगे।
 
अब गिरफ्तार होते ही ज्यादातर लोग बीमार पड़ जाते हैं। कोडा का पेट खराब हो गया। बूटा सिंह के बेटे सरबजोत का दिल बैठ गया। उन्हें कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा। इनमें से किसी को डॉक्टर नहीं कहते, ‘तुम्हें कुछ नहीं हुआ है। घर जाओ भाई।’ लेकिन वे करते यह हैं कि उनके तमाम टेस्ट करा देते हैं। फिर उन्हें डिस्चार्ज करते हैं। इतने में उन्हें काफी वक्त मिल जाता है। वे आगे की सोच लेते हैं कि कैसे बचना है? वकीलों और दोस्तों से सलाह मशविरा हो जाता है। वे कुछ दिन न्यायिक हिरासत में रहते हैं। फिर जमानत की अर्जी दे देते हैं। एक बार जमानत मिलने के बाद कोई उन्हें नहीं पूछता। सब भूल जाते हैं।
 
क्या कोई जानता है कि दक्षिण भारत के मशहूर मंदिर के उन स्वामी का क्या हुआ, जिन्हें अपने ही मठ के एक शख्स को मारने का आरोप था। भ्रष्टाचार और औरतों से छेड़छाड़ के भी मामले थे। मैं तो यही जानता हूं कि उन्हें जमानत मिली थी। शायद अब वह मंदिर में फिर प्रार्थना करने-कराने में जुटे हैं। क्या कोई जानता है कि नटवर सिंह के बेटे पर लगे आरोपों का क्या हुआ? तब के विदेश मंत्री के बेटे जगत सिंह और उनके दोस्त अंदलीब सहगल पर इराक युद्ध के दौरान अनाज के बदले तेल मामले में भ्रष्टाचार के आरोप थे। मुझे सिर्फ यह पता है कि वे तीनों अपनी जिंदगी का लुत्फ उठा रहे हैं।

यही हाल सरबजोत सिंह का है। उन्होंने भी खुल कर घूस लेने की बात मान ली थी। लेकिन वह भी मजे में रह रहे हैं। यह गड़बड़ियां महज अपने कानून की नहीं हैं। अपना मीडिया भी उसमें कम कसूरवार नहीं है। अक्सर मीडिया किसी मामले को उसकी मंजिल तक कवर नहीं करता। उसे करना यह चाहिए कि घूसखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की तह तक जाएं। जब तक उनका फैसला न हो जाए उनका पीछा न छोड़ें।

ईद मुबारक
एक वक्त था, जब मैं अपने मुसलमान दोस्तों को उनकी तीनों ईदों पर मुबारक देता था। वे अपनी तीनों ईदों को अलग अहमियत देते हैं। वे ईद उल फितर को सबसे ज्यादा मानते हैं। वह रमजान से जुड़ी है। उसके बाद ईद उल जुहा यानी बकरीद है। यह इब्राहीम के बेटे की कुर्बानी से जुड़ी है। हजरत मोहम्मद के जन्मदिन पर मनाई जाती है ईद ए मिलाद उन नबी। लेकिन उसे उतना जोश से नहीं मनाया जाता।
 
तीनों ही ईदों पर लोग गले मिलते हैं। वह भी तीन बार और ईद मुबारक कहते हैं। मैं नहीं जानता कि आदमी लोग औरतों से भी ऐसे ही गले मिलते हैं। लेकिन मुझे एक ईद याद है। वह गोवा में पड़ी थी। और मैं शबाना आजमी से गले मिला था। यह जावेद अख्तर से उनकी शादी से बहुत पहले की बात है। मुझे यह भी मालूम नहीं है कि मुल्ला-मौलवी एक काफिर के इस तरह गले मिलने को क्या मानते हैं? शायद वे उसे मंजूरी न दें। अगर उनका वश चले तो वे मेरा हाथ ही कटवा दें। लेकिन मैं उस तीन बार गले मिलने के लिए अपने हाथ भी कटवाने को तैयार हूं।
 
अब मैं उस मौके पर किसी को फोन नहीं करता हूं। बूढ़ा हो गया हूं। कानों से ठीक सुनाई नहीं पड़ता। और सही बात है उतना जोश भी नहीं रह गया। लेकिन मुसलमान दोस्तों के लिए मेरी भावनाएं वही हैं।
 
पिछले साल ईद उल जुहा खुशनुमा एहसास ले कर आयी थी। मेरी पड़ोसी दिलशाद शेख ने खीर का कटोरा भेजा था। मैं अपने कमरे में उन्हें शुक्रिया अदायगी की चिट्ठी लिख रहा था। तभी वह बीना रमानी के साथ चली आईं। वह हल्के गुलाबी रंग का सलवार और कुरता पहने हुई थीं। हीरे का हार और और झुमके लटक रहे थे। मैंने उनसे खूबसूरत औरत ही नहीं देखी। वह दादी बन चुकी हैं। लेकिन अब भी बीस साल की ही लगती हैं। बीना ने अपनी किताब के बारे में बताया, जो वह लिख रही हैं। जेसिका लाल हत्याकांड की वह गवाह हैं। उनके रेस्त्रां में ही वह हत्या हुई थी। अगर ठीक से लिखी गई, तो वह बेस्टसेलर हो सकती है।

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