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25 अक्तूबर, 2020|4:04|IST

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अपने-अपने तेलंगाना

अगर बीसवीं सदी का आखिरी और इक्कीसवीं सदी का पहला दशक क्षेत्रीय और छोटे दलों के केंद्र में सत्तारूढ़ होने के लिए जाना जाएगा तो इस सदी का दूसरा दशक देश भर में छोटे-छोटे राज्यों के उदय के लिए जाना जाएगा। केंद्र  की तरफ से तेलंगाना राज्य के गठन की हामी भरने और मायावती के छोटे राज्यों के पक्ष में आने के साथ पूरे देश में जिस तरह की राजनीतिक आहटें शुरू हुई हैं उससे यही आभास हो रहा है।

इस सिलसिले पर ज्यादा खुशी या दुख जताने के बजाय इसे भारतीय लोकतंत्र के नए अध्याय के रूप में देखा जाना चाहिए। यह उदारीकरण के पिछले दो दशकों में पैदा हुई आर्थिक विकास की असमानता के खिलाफ एक तरह से सब्र के बांध का टूटना भी है और किन्हीं उम्मीदों में सोए पड़े क्षेत्रीय आंदोलनों का जाग पड़ना भी है। हालांकि भाषाई आधारों पर राज्यों के गठन की मांग नेहरू युग में भी उठी थी। तब भी उसका वेग इतना प्रचंड था कि भाषाई आधार पर राज्य बनाने के लगभग विरोध में खड़े नेहरूजी को राज्य पुनर्गठन आयोग बनाना पड़ा था और उसकी सिफारिशों को सिद्धांत रूप में मानना पड़ा था।

माना जाता है कि अगर छोटे राज्यों के आंदोलन के पीछे उपराष्ट्रीयता की भावनाएं और इनकी अगुआई करने वाले नेताओं की क्षत्रप बनने की महत्वाकांक्षा काम करती है तो जनता की अपने ढंग से अपना विकास करने की आकांक्षा भी रहती है।

उदारीकरण का दौर अगर स्टेट यानी सरकार के ढांचे में जकड़ी अर्थव्यवस्था के मुक्त होने के लिए जाना जाता है तो राष्ट्रवाद की व्यापक और लुभावनी परिभाषा में फंसी जातीयता (इथनिसिटी) के स्वायत्त होने के लिए भी चिह्न्ति किया जाता है। शुक्र मनाइए कि भारत में जातीयता के आंदोलनों ने चेकोस्लोवाकिया और श्रीलंका जैसा प्रचंड रूप नहीं धारण किया। पर अगर विकास में विधिवत भागीदारी नहीं हासिल हुई तो भारत में भी जातीयता और पिछड़ापन हिंसा के नए दौर में प्रवेश कर सकता है।

इसलिए छोटे राज्यों की उभरती मांगों पर एक दीर्घकालिक योजना के साथ काम करने की जरूरत है। इस बारे में कुछ साल पहले देश को पचास छोटे राज्यों और दस नगर प्रदेशों में भी बांटने की योजना आई थी । कहा गया था कि इससे लंबे समय तक ऐसा विवाद नहीं होगा, लेकिन क्या छोटे राज्यों का गठन अपने आप में  विकेंद्रीकरण का आदर्श रूप है? भारत के संघीय ढांचे में राज्य छोटे होने से क्या केंद्र और मजबूत नहीं हो जाएगा? इन सैद्धांतिक और व्यावहारिक सवालों पर विशेषज्ञों को विमर्श करना चाहिए।

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