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28 मई, 2020|8:01|IST

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सौहार्द की जलवायु

सीमा विवाद और दूसरे स्थानीय विवाद अपनी जगह हैं लेकिन ऐसे क्षेत्र ज्यादा हैं जिनमें चीन और भारत सहयोग कर सकते हैं बल्कि उन्हें करना ही होगा। इनमें से एक मुद्दा कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन के लिए साझा रणनीति है, इसीलिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की मुलाकात मायने रखती है। पिछले कुछ दिनों से विकसित देशों की एक रणनीति सामने आ रही है, वे चुपचाप एक साझा रणनीति बना रहे हैं जिसके तहत कॉर्बन उत्सजर्न में कमी का सारा बोझ बड़े विकासशील देशों यानी चीन, भारत, ब्राजील वगैरा पर डाल दिया जाए।

इन देशों ने क्योटो प्रोटोकाल का पालन तो नहीं किया लेकिन अब ये चाह रहे हैं कि कॉर्बन उत्सजर्न के मामले में भारत जैसे देशों को कानूनी बाध्यता की शर्तो में फंसा दिया जाए। भारत ने तमाम छोटे विकासशील देशों का एक समूह बनाकर साझा रणनीति बनाई थी, लेकिन विकसित देशों ने कई छोटे विकासशील देशों को छोड़ कर इस एकता में दरारें डाल दी हैं। ऐसे में जरूरी ही है कि भारत और चीन इस एकता को बनाए रखने की भी कोशिश करें और मिलकर अपनी बात पर जोर दें।

दरअसल यह भी समस्या रही है कि विकासशील देशों में एक दूसरे के प्रति अविश्वास है। छोटे देशों को यह लग रहा है कि ग्लोबल वार्मिग की सबसे ज्यादा मार उन्हें पड़ेगी लेकिन इस मामले में भारत और चीन जैसे देश अपनी सुविधा ही देखेंगे। भारतीयों में कुछ को यह शक है कि चीन अपने पुराने मित्र अमेरिका के साथ कुछ गुपचुप सांठगांठ न कर ले और चीनियों में भारत के प्रति ऐसा शक है। लेकिन तमाम विकासशील देशों के समझदार लोग जानते हैं कि सबका हित सामूहिक रणनीति बनाने में है। विकसित देशों की समस्या तो अपनी खर्चीली जीवनशैली को बरकरार रखने की है इसीलिए वे क्योटो समझौते पर एक कदम आगे नहीं बढ़े, बल्कि पीछे ही हटे हैं।

विकासशील देशों के लिए समस्या अपने लोगों के लिए बुनियादी सुविधाएं जुटाने की है और यह बात भारत, चीन और ब्राजील जैसी तथाकथित उभरती हुई आर्थिक ताकतों के लिए भी सही है। विकसित देश छोटे विकासशील देशों को यह बता रहे हैं कि अब ग्लोबल वार्मिग के जिम्मेदार बड़े विकासशील देश हैं और ग्लोबल वार्मिग से बचने के लिए जो आर्थिक सहायता दी जाएगी उसका बड़ा हिस्सा भी ये ही ले जाएंगे। ऐसे में भारत और चीन के प्रधानमंत्रियों का मिलकर एक साझा मोर्चा बनाना महत्वपूर्ण है।

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