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खबरदार कम हो रही हैं लड़कियां!

महिला-दिवस के मौके पर ये खबर दिल्ली-वासियों के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं है। यहां लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है। सन 2001 की जनगणना के समय राष्ट्रीय राजधानी में जो शिशु लिंग अनुपात (प्रति 1000 लड़कों पर) 865 था, वह अब कुछ इलाकों में घटकर 846 तक रह गया है।ड्ढr ड्ढr वंचित समुदायों के छह साल से कम उम्र के बच्चों की सेहत और लालन-पालन पर काम करने वाले संगठनों के नेटवर्क ‘फोर्सेज’ का कहना है कि बच्चोंे की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए रखे गए सरकारी बजट का ठीक से इस्तेमाल न होने के कारण लिंग-अनुपात में गिरावट आने का क्रम अब भी जारी है। ‘फोर्सेज’ के ताजा सव्रेक्षण के मुताबिक पिछले आठ साल में दक्षिण-पश्चिम दिल्ली का शिशु लिंग अनुपात 846, उत्तर-पश्चिम दिल्ली का 857 और पश्चिम दिल्ली का 85रह गया है। ‘फोर्सेज’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि राजधानी के ग्रामीण इलाकों को सरकार के एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम (आईसीडीएस) के तहत प्रसव के समय और बाद में चिकित्सा और पोषण संबंधी जितनी सुविधाएं मिलनी चाहिए, उनकी आधी भी नहीं मिल पा रही हैं। दिल्ली में केवल 35 प्रतिशत बच्चों को इसका फायदा मिल पाता है।ड्ढr ड्ढr रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि सरकार लिंगानुपात में आ रही गिरावट के बावजूद कोई गंभीर कदम नहीं उठा रही है, जबकि इसके लिए कागा पर कई स्कीमें पहले से बनी हुई हैं। सरकारी उपेक्षा का अंदा इसी से लगाया जा सकता है कि देश की कुल आबादी के 41 प्रतिशत हिस्से (यानी बच्चों) के लिए बजट प्रावधान केवल 5 प्रतिशत रखा जाता है। दिल्ली में निर्धन वर्ग के केवल 11 प्रतिशत बच्चों को प्रसव के समय सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं नसीब हो पाती हैं। यहां केवल 34 प्रतिशत नवजात शिशुओं को स्तनपान कराया जाता है, और इससे वंचित केवल 1प्रतिशत बच्चों को ही जन्म के समय कोलस्ट्रम (नवदुग्ध) मिल पाता है।ड्ढr ड्ढr महिला और बाल विकास के क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता इस हालत से काफी चिंतित हैं। उनका कहना है कि सरकार के रवैये की वजह से दिल्ली में बड़ी संख्या में नवजात शिशु खून की कमी, कुपोषण और जन्म के कुछ वक्त बाद ही मौत के शिकार हो जाते हैं।

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